पिथौरागढ़, जागरण कार्यालय : लंबे समय बाद जनवरी माह में अपेक्षित वर्षा और हिमपात होने से उच्च मध्य हिमालयी भू-भाग में उत्पादित आलू, राजमा और सेब उत्पादकों में नई आशा का संचार हुआ है। वर्षा और हिमपात तीनों फसलों के लिए वरदान साबित हुई है।
उल्लेखनीय है कि पर्वतीय क्षेत्र में विगत डेढ़ दशक से मौसम का चक्र परिवर्तित हो गया था। शीतकाल में वर्षा और हिमपात होना कम हो गया था, जिसका सीधा प्रभाव आलू, राजमा और सेब उत्पादन पर पड़ रहा था। आलू और राजमा उत्पादित क्षेत्र में सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है। उत्तम कोटि का आलू और राजमा सात हजार फीट की ऊंचाई पर ही होते हैं। जहां पर सबकुछ आसमान पर ही निर्भर है। इसके लिए भी शीतकाल में पर्याप्त वर्षा और हिमपात की जरुरत होती है।
पिछले डेढ़ दशक के बीच मौसम चक्र में हुए परिवर्तन के कारण दिसम्बर जनवरी माह के बजाय फरवरी अंत या फिर मार्च माह में बर्फवारी हो रही थी। मार्च माह तक सूरज की तपिश इस कदर बढ़ जाती है कि ताजा हिमपात अधिक समय तक जम नहीं सकता है, जिसके चलते आलू, राजमा और सेब को अनुकूल वातावरण नहीं मिल पा रहा था। परिणामस्वरूप तीनों फसलों के उत्पादन पर प्रभाव पड़ रहा था। लंबे समय बाद जनवरी माह में आलू, राजमा और सेब के अनुकूल मौसम मिला हुआ है। मौसम के प्रतिकूल रहने के कारण मुनस्यारी के बौना, तौमिक, साईपोलो तथा धारचूला के सोसा, भटका, नारायणआश्रम, सिर्खा जैसे क्षेत्रों में सेब उत्पादन शून्य हो गया था।
कृषि एवं उद्यान विशेषज्ञों के अनुसार सेब के लिए 18 सौ घंटे चिलिंग प्वाइंट चाहिए, जो गत वर्षो तक नहीं मिल पा रहे थे। इस बार समय पर भारी हिमपात होने के कारण पर्याप्त चिलिंग प्वाइंट मिलने की संभावना है। इससे सेब को नवजीवन मिलने की संभावना है। वहीं कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमपात के चलते भूमि में उत्पन्न नुकसानदेह कीटों का समूल नाश होगा। उनके अनुसार हिमपात प्राकृतिक कीटनाशक है। इस बार का मौसम उच्च मध्य हिमालयी क्षेत्र में उत्पादित आलू, राजमा और सेब उत्पादन के लिए विशेष लाभदायक होगा।