अल्मोड़ा, जाका: पहाड़ में अबकी हाड़ कंपाती ठंड बढ़ी तो सर्द दिनों की संख्या में भी इजाफा हो गया है। इस बार शरदकाल में बीते वर्ष की तुलना ठंडे दिनों के लिहाज से एक पखवाड़े का अंतर आया है। इसके उलट पिछले सीजन में सर्दी तो थी लेकिन लंबी नहीं खिंची। वहीं तापमान में गिरावट भी नए कीर्तिमान की राह पर बढ़ रही है।
दरअसल, पिछले दो वर्षो का जिक्र करें तो इस बार के अधिकतम तापमान में तीन से पांच डिग्री सेल्सियस गिरावट आई है। यही हाल न्यूनतम पारे का भी रहा। यह भी 2009 व 2010 की तुलना में 1.5 से दो डिग्री नीचे खिसका है। दिसंबर मध्य में शुरु हुआ यह सिलसिला जनवरी आखिरी पखवाड़े तक बरकरार है। खास बात रही इस बार अल्मोड़ा जनपद के उच्च इलाकों खासतौर पर जागेश्वर में बर्फबारी ने जहां पिछले पांच सालों का रिकॉर्ड तोड़ा, वहीं न्यूनतम तापमान भी अधिकांश दिनों शून्य रहा। धूल खिलने पर बमुश्किल तीन डिग्री तक ही चढ़ा। यही हाल कमोवेश अधिकतम तापमान का भी है। बीते वर्ष जनवरी आखिर में अधिकतम पारे ने 20 तक का आंकड़ा छूआ लेकिन अबकी सर्दी में एकाध दिन चटक धूप खिलने पर जैसे-तैसे 17 डिग्री का सफर ही तय किया। पंतनगर विवि के मौसम विज्ञानी डॉ.एचएस कुशवाहा के अनुसार वाकई इस साल सर्दी के साथ ही ठंडे दिनों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। चूंकि पर्वतीय अंचल के उच्च हिस्सों में बादलों की मौजूदगी बनी हुई है लिहाजा सर्द दिनों की संख्या में और इजाफे की संभावना है।
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क्यों और कैसे पड़ता है 'पाला'
अल्मोड़ा: नमी युक्त हवा से पाला बनने तक सफर बेहद रोचक है। दरअसल, जाड़ों में दक्षिण-पूरब दिशा से बहने वाली हवा के झोंके बर्फबारी वाले क्षेत्रों से टकराने के बाद नमी लेकर मध्य व निचले भूभाग की ओर पहुंचते हैं। ऐसे में हवा बेहद ठंड हो जाती है। तापमान में भी तेजी से गिरावट आ जाती है और ठंड बढ़ जाती है। मौसम विज्ञानी डॉ.एचएस कुशवाहा के मुताबिक जब तापमान तीन डिग्री से नीचे आ जाता है तो रात में हवा और ठंड हो जाती है। इससे पानी जमने लगता है। सूखी मिट्टी व पत्तियों पर नमीयुक्त हवा में मौजूद पानी ठोस अवस्था में जम जाता है और सफेद चादर सी बिछ जाती है। इसके उलट यदि तीन डिग्री से ऊपर तापमान पहुंचा तो पाला अपेक्षाकृत कम या पड़ता ही नहीं।