04 Jul 09, 6:05 am
नई दिल्ली [अंशुमान तिवारी]। अरे!!!! ममता दीदी की इस डबल डेकर ट्रेन में तो दूसरी मंजिल पर जाने का रास्ता ही नहीं है। दीदी ने रेलवे के लिए दूसरी मंजिल तो खूब बनाई, लेकिन वहां जाने की सीढ़ी बनाना भूल गई। बजटट्रेन पुरानी और घिसी-पिटी नहीं है। इसमें रेलवे की कई अगली मंजिलों का नक्शा झलक जाता है लेकिन अफसोस कि उनके नीचे संसाधनों की बुनियाद नहीं है। ..और ममता दीदी, ट्रेन के हवा में उड़ने की तकनीक अभी ईजाद नहीं हुई है।
..बड़ा सुकून मिला यह जानकर कि अब माटी से जुड़े मानुष 25 रुपये की मासिक टिकट में सौ किलोमीटर का सफर करेंगे। यह सुनना भी अच्छा लगता है कि डाकघर से लेकर मोबाइल वैन तक, जगह-जगह रेल टिकट मिलेगी। बजट लंबी दूरी के लिए वातानुकूलित सस्ती ट्रेनों का तोहफा भी ला रहा है। ..मगर झटका उस वक्त लगता है जब यह नजर आता है कि रेलवे का संचालन रेश्यो फिर 90 फीसदी का आंकड़ा पार गया है। यानी कमाई का 90 फीसदी खर्च। ममता जी, रेलवे में पिछली मुश्किलों की शुरुआत यहीं से हुई थी।
यह ठीक है कि रेलवे यात्री सुविधाओं के अगले स्तर पर निगाह जमा रही है। ट्रेन में डाक्टर, लांड्री आदि की बात हो रही है। इंटरनेट कैफे, आन बोर्ड थियेटर, मनोरंजन केंद्र भी आने चाहिए। रेल बजट, जब निजी कंपनियों के साथ लाजिस्टिक्स पार्क, कोल्ड ट्रेन, प्रीमियम कंटेनर, दोमंजिला यात्री ट्रेन की बात करता है तो लगता है कि रेलवे की नजर आधुनिकीकरण कीअगली मंजिल पर है।
..लेकिन ममता दीदी हम भी क्या करें? आंकड़े इन उम्मीदों पर कालिख पोत देते हैं। रेलवे का इंजन माल भाड़े के ईधन से चलता है। एक साल पहले तक आपकी रेलवे की भाड़े से कमाई करीब नौ फीसदी की दर से बढ़ रही थी। जो मंदी के कारण पांच फीसदी पर रह गई। यात्री किराये से आमदनी का बहुत मतलब नहीं है, क्योंकि कुल कमाई में इसका हिस्सा 20 फीसदी है। अब भला जब पैसा ही नहीं होगा तो क्या खाक आधुनिकीकरण होगा।
माना कि आप नए स्रोतों से संसाधन लाने की जुगत जरूर भिड़ाएंगी, लेकिन रेलवे के हाथी का पेट घास के छोटे गट्ठरों से भरने वाला नहीं है। बजट बताता है कि रेलवे कर मुक्त बांड जारी कर बाजार से संसाधन लाएगी। लेकिन होगा तो वह कर्ज ही न, जो कि पहले भी रेलवे की समस्या रहा है।
इस रहमदिली को सलाम कि न यात्री किराया बढ़ा और न ही माल भाड़ा। लेकिन उलझन यह है कि रेलवे चलेगी कैसे? कैसे उठाएगी वह आपकी इतनी महत्वाकांक्षी योजनाओं और लोगों की उम्मीदों का बोझ। बांटता वह है जिसकी जेब भरी होती है, रेलवे की जेब तो खाली हो रही है। कमाई के लिए कुछ नया सोचिए, मैडम! ज्यादा उदारता के चक्कर में रेलवे पहले भी झटके खा चुकी है।
ममता दीदी..आपके बजट में रेलवे के लिए नई मंजिलों की तामीर है। अलबत्ता ये मंजिलें अभी हवा में हैं, बस जल्द से जल्द उनके नीचे मजबूत संसाधनों की बुनियाद बना दीजिए और देखिए रेलवे का सफर कितना आधुनिक और सुहाना हो जाएगा।
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