06 Jul 09, 9:05 pm
नई दिल्ली [नितिन प्रधान]। अब उद्योग जगत को भी वास्तविकता स्वीकार करनी होगी। टैक्स के मामले में राहत की बहुत ज्यादा उम्मीद बांधना अर्थव्यवस्था के इन हालात में उचित नहीं है। पिछले साल की मंदी के बाद कर राजस्व के मोर्चे पर जो स्थितियां बनी थीं, उनमें वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के झोले से इससे ज्यादा निकलना शायद मुमकिन नहीं था। हां, वित्त मंत्री चाहते तो उद्योगों को भविष्य के लिए एक ठोस दिशानिर्देश दे सकते थे।
कारपोरेट टैक्स या उस पर लगने वाले सरचार्ज की दर में कमी नहीं होने से उद्योग निराश होगा। चूंकि मंदी की वजह से कंपनियों के प्रदर्शन पर काफी असर हुआ है, इसलिए कंपनियां चाहती थीं कि कुछ राहत मिल जाए। लेकिन क्या वित्त मंत्री के लिए ऐसा करना संभव था? पिछले वित्त वर्ष में सरकार के खजाने की हालत वैसे भी पतली ही रही। संशोधित अनुमानों के मुताबिक कुल कर राजस्व 8 प्रतिशत कम हो गया। कारपोरेट टैक्स में भी कमी आई। ऊपर से इस बार वित्त मंत्री पर सामाजिक विकास की योजनाओं के लिए खर्च बढ़ाने का दबाव भी था।
इसके बावजूद वित्त मंत्री ने फ्रिंज बेनिफिट टैक्स (एफबीटी) को वापस लेकर उद्योग जगत को राहत देने की कोशिश की है। राजस्व में थोड़ा ही सही, लेकिन एफबीटी का योगदान तो था ही। उद्योग जगत से भी इसे वापस लेने की पुरजोर वकालत हो रही थी। लिहाजा वित्त मंत्री ने इसे वापस लेने का ऐलान कर ही दिया। इसके अलावा मंदी की शुरूआत होने के बाद सरकार उद्योगों को तीन राहत पैकेज पहले ही दे चुकी है। उसके भी कई टैक्स प्रावधानों को वित्त मंत्री ने इस बजट में बरकरार रखा है।
हालांकि न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) की दर बढ़ने से उद्योगों को तकलीफ होगी। एफबीटी के नाम पर जितना मिला नहीं, उससे ज्यादा वित्त मंत्री ने मैट के जरिए वापस ले लिया है। मंदी से पीडि़त उद्योगों की हालत अब सुधरती दिख रही है। माना जा रहा है कि कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ेगा। लिहाजा इस मुनाफे पर लगने वाले मैट की दर बढ़ने से सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी होना लाजमी है। ऐसा करके वित्त मंत्री ने 'इस हाथ दे और उस हाथ ले' की कहावत को चरितार्थ कर दिया है।
हालांकि उद्योग की मांग तो सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स (एसटीटी), लाभांश पर दिएजाने वाले टैक्स (डीडीटी) को हटाने की भी थी। आर्थिक समीक्षा में भी इन्हें हटाने की सिफारिश थी, लेकिन राजस्व में कमी के चलते इनमें फेरबदल करना भी संभव नहीं था। जहां तक सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क में हुए बदलावों का सवाल है, वित्त मंत्री ने उन्हीं दरों को छुआ है जिनमें फेरबदल करना बहुत जरूरी था।
इन सब मजबूरियों के बावजूद वित्त मंत्री को एक काम करना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। मंदी से जूझ रहे उद्योगों को वित्त मंत्री की तरफ से एक व्यापक नीतिगत दिशानिर्देश की दरकार थी। मंदी से निकलते हुए उद्योग किस दिशा में आगे बढ़ेंगे और सरकार का रुख क्या होगा, वित्त मंत्री इस बजट में यह बताने में असमर्थ रहे हैं। उद्योग जगत कई क्षेत्रों में नीतियों को उदार बनाए जाने का इंतजार भी कर रहा है। संसद के पहले सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण और फिर आर्थिक समीक्षा ने उद्योगों में जो उम्मीद की किरण जगाई थी, उसे वित्त मंत्री उजियारे में नहीं बदल पाए। और यहीं वित्त मंत्री के नंबर कट जाते हैं।
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