सौ खरब का तिलिस्म   
 
 
06 Jul 09, 10:40 pm   

नई दिल्ली [अंशुमान तिवारी]। मंदी के मारों को राहत, एक बड़ा टैक्स गायब और ऊपर से कर रियायत, सबको लुभाने वाली तरह-तरह की अदाएं और सरकारी स्कीमों के लिए पैसे की धाराएं..दस लाख करोड़ रुपये के खर्च का तिलिस्म है यह!!! इसके असर पर मत जाइए, बस दादा का बजट जादू देखते जाइए। प्रणब दा का बजट लोगों पर पुराना नपा-तुला लोकुलभावन कांग्रेसी सम्मोहन करता है और सुधारों के मंत्र या घाटे की चिंताओं को फिलहाल पीछे रखता है। वित्त मंत्री ने उद्योगों को लुभाने के लिए कोई खास अदा नहीं दिखाई, इसलिए शायद शेयर बाजार ने भी बजट को पीठ दिखा दी है।

..गायब.आया!

पिछले करीब दो साल से नियोक्ताओं और कर्मचारियों को सता रहा फ्रिंज बेनिफिट टैक्स (कर्मचारियों को नियोक्ताओं से मिलने वाली सुविधाओं पर लगने वाला कर - एफबीटी) प्रणब बाबू के एक इशारे पर गायब हो गया है और जिंस कारोबार पर लगने वाला कर बिना लागू हुए इतिहास बन गया है। लेकिन उद्योग मिनिमम अल्टरनेटिव टैक्स यानी मैट का ज्यादा बोझ उठाएंगे।

ज्यादा दुख, थोड़ी खुशी

जीरो टैक्स कंपनियां दुखी हैं, लेकिन व्यक्तिगत आयकरदाताओं को यह जादू फलने वाला है क्योंकि एफबीटी हटने के साथ बोनस में उन्हें आयकर की मामूली ही सही, राहत तो मिल रही है। यहां तक कि ऊंची कमाई वालों के लिए प्रणब बाबू ने आयकर पर लगने वाला सरचार्ज भी गायब कर दिया है। मंदी के इस दौर में कंपनियों को प्रणब बाबू की बेरुखी दर्द पहुंचाएगी, क्योंकि अब रियायत की कोई उम्मीद अगले ही बजट में पूरी हो पाएगी।

अगले साल जीएसटी का खेल

प्रणब बाबू ने कर ढांचे पर अगर सरलीकरण का मंत्र चलाया है तो वह अगले साल एक अप्रैल से सेवा व उत्पाद शुल्क यानी जीएसटी का खेल भी शुरू करने को तैयार हैं। यानी सेवा व उत्पाद शुल्क की दरें एक समान हो जाएंगी। कर ढांचे के मामले में इस खेल के कई रंग हैं। उत्पाद व सीमा शुल्क ढांचे में फेरबदल के जरिये यह कई क्षेत्रों को चुनिंदा रूप से कर रियायतें बांट रहा है और कृषि सहयोगी बुनियादी ढांचे व गैस पाइपलाइन आदि में निवेश के लिए कर छूट भी दे रहा है।

दस लाख करोड़ का इंद्रजाल!

प्रणब दादा ने अपने बजट शोर में दस लाख करोड़ के खर्च का तिलिस्म रचा है। भारत के इतिहास में पहली बार बजट खर्च का आंकड़ा इस ऊंचाई तक पहुंचा है। इस तिलिस्म में केंद्र सरकार की तमाम सामाजिक स्कीमें झलकती हैं, जिन्हें वित्त मंत्री ने अपने इंद्रजाल से मालामाल कर दिया है। गरीबी मिटाने के लिए राष्ट्रीय जीविका मिशन आएगा और शहरी गरीबों के लिए राजीव आवास योजना चलाई जाएगी। किसानों को सस्ते कर्ज की स्कीम और आकर्षक बनाई गई है तो सिंचाई की स्कीम के लिए भी आवंटन बढ़ा दिया गया है।

सिर्फ यही क्यों, संप्रग को सियासी लाभ देने वाली नरेगा हो या शहरों का ढांचा सुधारने के मकसद से बनी नेहरू शहरी नवीकरण योजना, भारत निर्माण की स्कीमें हों या फिर दलित व अल्पसंख्यकों के कल्याण कार्यक्रम। स्कीमों के मामले में यह जादू लुभाने वाला है। यह बात अलग है कि बुनियादी ढांचे पर बजट का जादू कमजोर हो गया है और इसलिए पैसे पाने के मामले में भी वह पीछे रह गया।

मंदी भगाने का मंतर!

मंदी के मारों के लिए यह जादू राहत पहुंचाने वाला है। दस लाख करोड़ का तिलिस्म अर्थव्यवस्था में वैसे भी मांग बढ़ाएगा। इसके अलावा प्रणब दा ने अपने बजट में उन क्षेत्रों पर ज्यादा कृपा बरसाई है जिन्हें मंदी की तगड़ी मार लगी है। वित्त मंत्री ने तमाम रियायतों व प्रोत्साहनों के साथ निर्यात के कान में फिर उठ खड़े होने का मंतर फूंका है। छोटे उद्योगों को ज्यादा कर्ज दिलाने के लिए 4000 करोड़ रुपये की विशेष निधि बनाई जा रही है। बजट ने मंदी से पीडि़त आटो उद्योग के लिए भी मदद का हाथ बढ़ाया है और कुछ कर रियायत और मांग बढ़ाने के उपायों के सहारे आवास क्षेत्र को भी मदद दी है।

खाली पिटारे का खेल!

यह जादू पूरी तरह खाली पिटारे का खेल है। सुधारों के मामले में प्रणब दा के हाथ खाली हैं और पैसे के मामले में झोली। इसलिए राजकोषीय घाटा जादूगर की कमजोरी को सामने ले आता है। आंकड़ों के खेल में हाथ की करामात नहीं चलती। इसलिए आंकड़े देखने के बाद पूरा इंद्रजाल बिखर जाता है और वशीकरण खत्म हो जाता है।

कठोर और तल्ख हकीकत

तो चलिए, इस सम्मोहन से बाहर आएं और आर्थिक हकीकतों से नजरें मिलाएं। हकीकतें कठोर और तल्ख हैं, लेकिन उम्मीद कायम है कि इस बजट के तंत्र-मंत्र कुछ तो असर दिखाएं और अगले साल के बजट में खुद को पहले से कुछ बेहतर पाएं।

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