06 Jul 09, 10:45 am
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बजट आर्थिक समीक्षा की तुलना में काफी बौना साबित हुआ। जहां आर्थिक समीक्षा से अंदाजा लगाया जा रहा था कि बजट में जबरदस्त घोषणाएं की जाएंगी, वहीं दादा का पिटारा सुधारों की जमीन भी कायदे से नहीं खुरच सका।
आर्थिक समीक्षा ने सुधारों का नया एजेंडा देश के सामने रखा था। इसे देखते हुए उम्मीद थी कि प्रणब कम से कम जरूरी क्षेत्रों में सुधारों का नया दौर शुरू करेंगे। लेकिन विनिवेश, ऊर्जा क्षेत्र, विदेशी निवेश, सरकारी खर्च जैसे सभी प्रमुख क्षेत्रों में यह बजट पुरानी लीक पीट कर गुजर गया।
विनिवेश जिस पर उद्योग और बाजार की निगाहें थीं, वहां यह बजट सार्वजनिक कंपनियों में सरकार की इक्विटी 51 फीसदी रखने की घोषणा करके मौन हो गया है। इसमें आम जनता को भागीदारी देने का संकेत भर है, लेकिन उसका भी स्वरूप स्पष्ट नहीं है। पिछले बजटों में वित्त मंत्री आमतौर पर विनिवेश से राजस्व का लक्ष्य तय करते थे। वह भी इस बजट में नहीं है यानी कि विनिवेश एजेंडे पर तो है, लेकिन एजेंडा अंधेरे में है।
सब्सिडी के मामले सुधारों का एक एजेंडा जरूर झलक जाता है। वित्त मंत्री ने उर्वरक सब्सिडी का ढांचा बदलने का निश्चय बजट में दिखाया है। किसानों को सीधे सब्सिडी देने की तैयारी है। यह सब्सिडी रासायनिक पोषक तत्वों के इस्तेमाल पर आधारित होगी। यह सुधार उर्वरक उद्योग को नए प्रयोगों के लिए प्रेरित करेगा।
ऊर्जा क्षेत्र में इस बजट से सुधारों की बहुत कमजोर रोशनी पड़ी है। प्रणब ने केवल पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण को लेकर कुछ सुधारों के संकेत दिए हैं। कोयला, बिजली वितरण जैसे क्षेत्र पूरी तरह छूट गए हैं। यही स्थिति अन्य बुनियादी ढांचा क्षेत्रों की भी है। इस बात की पूरी उम्मीद थी कि नरेगा आदि के लिए आवंटन बढ़ाने के साथ प्रणब स्कीमों की डिलीवरी सुधारने के लिए कुछ प्रयोग करेंगे, लेकिन इस पहलू पर भी बजट ने निराश किया है।
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