संगीत खोज रहा है अपनी रूह: आशा

संगीत खोज रहा है अपनी रूह: आशा

नई दिल्ली। आखिरी सांस तक गाते रहने की चाहत प्रकट करते हुए सुप्रसिद्ध पा‌र्श्व गायिका आशा भोंसले ने कहा है तकनीकी के बढ़ते प्रभाव के कारण आज का फिल्म संगीत अपनी रूह खोज रहा है। राजधानी में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आई आशा ने कहा, मैं आखिरी सांस तक गाना चाहती हूं। उनसे पूछा गया था कि कब तक गाते रहने का इरादा है। मजाहिया लहजे में उन्होंने कहा, एक ज्योतिषी ने मुझे बताया था कि मैं आठ साल और जीवित रहूंगी। लेकिन गाने के बारे में पूछने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा तो समझ लीजिए कम से कम आठ साल अभी और गाऊंगी।

छह दशक में फिल्मी संगीत में आए बदलाव के बारे में उन्होंने कहा, वक्त के साथ संगीत में काफी फर्क आया है। नया दौर से लेकर रंगीला के बीच में संगीत में तकनीकी का दखल काफी बढ़ गया है और वर्तमान समय का फिल्मी संगीत बिना रूह के इंसान की तरह हो गया है। आजकल का फिल्मी संगीत सुनकर ऐसा लगता है कि संगीत अपनी रूह को खोज रहा है। बेताल को ताल में ढाला जा रहा है और बेसुरे को सुर में ढाला जा सकता है। लेकिन भावनाएं किसी भी सूरत में नहीं ढाली जा सकती हैं। आशा ने कहा, वर्तमान संगीत को सुनकर बुजुर्ग से लेकर किशोर तक कोई भी इंसान थिरकने लगता है। नाचना अच्छा है, लेकिन हर वक्त नाचना अच्छा नहीं लगता है। खास तौर से मैं तो बिल्कुल भी पसंद नहीं करती हूं। आशा ने कहा कि एक जमाने में सुख और दुख, विरह और मिलन एवं वक्त के मुताबिक गीत लिखे जाते थे और उसी भावना से गाए भी जाते थे, लेकिन अब तो फिल्मी गीतों से कोई भाव निकालना बेहद मुश्किल हो गया है। अपनी गायकी के बारे में उन्होंने कहा, स्टूडियो में गाने के लिए जाने के पहले मैं साफ कह देती हूं कि 3 से 4 घंटे के पहले बाहर नहीं आऊंगी। जल्दी बाहर आने से गाने का तांता टूट जाता है।

वर्तमान संगीतकारों के बारे में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि प्रीतम, मोंटी, शंकर-एहसान-लॉय अच्छा कर रहे हैं, लेकिन ये चाहे तो और भी अच्छा कर सकते हैं। फ्यूजन म्यूजिक के बढ़ते प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा कि यह न तो अपना ही रहता है और न पराया ही रह जाता है। न तो भारतीय शास्त्रीय संगीत ही रह जाता है और न ही पश्चिमी संगीत का शुद्ध रूप रह जाता है। हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई कि उन्हें ऐसा लगता है कि आजकल के बच्चे अपने संगीत की तरफ वापस लौट रहे हैं। उनके घर में और परिचितों में कई बच्चे हैं, जो नृत्य और संगीत की हमारी सदियों पुरानी विरासत के वारिस बन रहे हैं।

आधुनिक फिल्मी गीतों के बारे में टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल ज्यादातर गीतों के बोल अच्छे नहीं होते। हालांकि, लिखने वालों की कमी नहीं है, आज भी गुलजार, जावेद अख्तर और समीर जैसे कई अच्छे गीतकार बॉलीवुड में है।

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