
जिंदगी के सबक किताबों से अधिक प्रभावकारी होते हैं। कई फिल्मकारों, साहित्यकारों, चित्रकारों और कलाकारों ने जिंदगी से मिले सबक को बांटा है। उन्होंने फिल्में बनाई, कहानियां लिखीं। चित्र बनाए। उन्हें अपने अभिनय और परफॉर्र्मेस में उतारा। मनुष्य का सहज स्वभाव है कि वह अपने अनुभव से दूसरों को अनुभवी करना चाहता है। सृजनशील व्यक्ति उन अनुभवों को कला का रूप देते हैं।
कौशिक राय की सृजनात्मक बेचैनी को हम उनकी फिल्म अपना आसमान देखकर समझ सकते हैं। कॉरपोरेट वर्ल्ड में सफल कौशिक राय के लिए कतई जरूरी नहीं था कि वे फिल्म बनाएं और वह भी एक संवेदनशील विषय पर, लेकिन अभिव्यक्ति की बेचैनी कोई कलाकार ही समझ सकता है। कौशिक राय ने निजी जिंदगी के अनुभवों को फिक्शन का रूप दिया। उन्होंने अपने नायक बुद्धि के माध्यम से एक ऐसी प्रेरक कथा कही है, जो विशेष किस्म के बच्चों के मां-बाप के लिए प्रेरणा बन सकती है। उन्होंने यह फिल्म संदेशात्मक या डॉक्यूमेंट्री शैली में नहीं पेश की है। रोचक शैली में पेश की गई अपना आसमान आम दर्शकों के दिलों को भी स्पर्श करेगी। इसके किरदार स्वाभाविक हैं। हम अपने आसपास जिंदगी और सपनों से जूझते ऐसे किरदारों को देख सकते हैं।
रवि कुमार और पद्मिनी कुमार आम मध्यवर्गीय दंपति हैं। उनकी संतान हैं बुद्धि.., वह सामान्य शिशु नहीं है। अलग किस्म से सक्षम बुद्धि की विशेषताओं को रवि और पद्मिनी नहीं समझ पाते। लंबे समय तक वे चाहते हैं कि उनका बेटा बुद्धि भी दूसरे बच्चों की तरह सामान्य हरकत करे। ऐसा नहीं हो सकता। एपिलेप्सी के कारण बुद्धि के सीखने और याद रखने की क्षमता धीमी हो गई है। उसकी असामान्यता ही रवि और पद्मिनी की चिंता का सबसे बड़ा कारण है। बुद्धि जब बहुत छोटा था, तब रवि की गोद से फिसल कर गिर गया था। रवि को लगता है कि उस दुर्घटना के कारण ही बुद्धि सामान्य नहीं रहा, जबकि डॉक्टरों की राय अलग है। पद्मिनी को लगता है कि सही उपचार के बाद उनका बेटा सामान्य हो जाएगा। अपनी-अपनी आकांक्षाओं को बेटे में देख रहे मां-बाप के लिए बहुत मुश्किल होता है कि वे वस्तुस्थिति स्वीकार करें और फिर बेटे की विशेषताओं को विकसित करें। रवि और पद्मिनी ऐसे ही मां-बाप हैं।
अपना आसमान में इरफान खान और शोभना ने रवि और पद्मिनी की भूमिकाओं को बखूबी निभाया है। इनके अलावा, फिल्म में रजत कपूर, अनुपम खेर, नासिर अब्दुल्ला और उत्कर्षा नाइक भी हैं। बुद्धि की चैलेंजिंग भूमिका ध्रुव पीयूष पंजुआनी ने निभाई है।
कौशिक राय के बेटे ओक्रो के जीवन से प्रेरित यह फिल्म स्थितियों को स्वीकार कर परिस्थितियों पर विजय पाने की कहानी कहती है। कौशिक ने विनोदी और रोचक शैली में इसे पेश किया है। कौशिक निर्देशक होने के साथ ही स्वशिक्षित पेंटर भी हैं। उन्हें फिल्म निर्देशन का गुण पारिवारिक परिवेश से मिला है, जिसे उन्होंने खुद मांजा और विकसित किया है। वे मशहूर फिल्मकार बिमल राय के भतीजे हैं।
इसे संयोग ही कहें कि लगभग इसी विषय पर आमिर खान की फिल्म तारे जमीं पर आधारित है। कौशिक राय इस संयोग से परेशान नहीं हैं। उनकी राय में, इस विषय पर और भी फिल्में आनी चाहिए, ताकि विशेष संतानों के मां-बाप उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में पाल सकें।