
भोजपुरी फिल्मों के लिए यह सुनहरा दौर है। कभी निम्नस्तरीय समझी जाने वाली भोजपुरी फिल्में अब सुधि दर्शकों तक भी अपनी पहुंच बनाने में कामयाब हो रही हैं। अब लगता है कि वह दिन दूर नहीं, जब मल्टीप्लेक्स में भी भोजपुरी फिल्में दिखाई जाएंगी। पिछले साल दीपक सावंत निर्मित भोजपुरी फिल्म गंगोत्री की मल्टीप्लेक्स में प्रदर्शित होने की योजना थी, लेकिन किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाया। दरअसल, भोजपुरी फिल्मों में दर्शकों की रुचि बढ़ने के कारण अब भोजपुरी फिल्मों में कॉरपोरेट जगत भी रुचि लेने लगा है और इसीलिए बड़ी-बड़ी कंपनियां भोजपुरी फिल्मों के निर्माण से जुड़ने की इच्छुक हैं।
कॉरपोरेट जगत ने भी अब भोजपुरी फिल्मों में निवेश करना शुरू कर दिया है। आने वाली फिल्म हम बाहुबली के साथ इसकी शुरुआत हो चुकी है। इस फिल्म के निर्माण में भागीदार बनकर ऑटोमोबाइल कंपनी महिन्द्रा ऐंड महिन्द्रा ने इस परंपरा को आरंभिक मोड़ दिया है। हम बाहुबली की निर्माता कंपनी यशी फिल्म्स के अभय सिन्हा भोजपुरी फिल्मों में कारपोरेट जगत की रुचि को लेकर बेहद उत्साहित हैं। वे आशा व्यक्त करते हैं, भोजपुरी फिल्मों के लिए यह अच्छा समय है। हमारे लिए खुशी की बात है कि बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां भोजपुरी फिल्मों से जुड़ना चाहती हैं। निकट भविष्य में रिलायंस और यू टीवी जैसी बड़ी कंपनियों के भी भोजपुरी फिल्मों से जुड़ने के संकेत मिल रहे हैं। जल्द ही हम भोजपुरी फिल्मों को साउथ फिल्म इंडस्ट्री के स्तर का बनाने में कामयाब रहेंगे। दरअसल, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा कंपनी ने मुंबई मंत्रा नाम की एक फिल्म-निर्माण कंपनी की स्थापना की है, जिसने भोजपुरी फिल्मों की निर्माता कंपनी यशी फिल्म्स के साथ पांच फिल्मों का करार किया है। इन पांच फिल्मों की श्रृंखला की पहली कड़ी हम बाहुबली है। उम्मीद है इस फिल्म की गुणवत्ता देखकर भोजपुरी फिल्मों से नए दर्शक वर्ग भी जुड़ेंगे। अब यदि यह कहें कि भोजपुरी फिल्में भी हिंदी फिल्मों के साथ कदमताल कर रही हैं, तो शायद गलत नहीं होगा।
भोजपुरी फिल्मों का बाजार लगातार बढ़ रहा है। इसीलिए निर्माता-निर्देशक भोजपुरी भाषी दर्शकों को वैसी फिल्में उपलब्ध कराना चाहते हैं, जो बजट और भव्यता में हिंदी फिल्मों को टक्कर दे, लेकिन वित्तीय कमी के कारण उनका यह प्रयास कभी-कभी ही कारगर हो पाता है। सच तो यह है कि अच्छी कहानी, अच्छे कलाकार होने के बावजूद वित्त की कमी के कारण उन्हें अपनी फिल्म के कलात्मक और तकनीकी पक्षों से समझौते करने पड़ते हैं। दरअसल, ऐसी स्थिति में निश्चित रूप से कॉरपोरेट जगत का भोजपुरी फिल्मों की ओर रुझान उन महात्वाकांक्षी निर्माता-निर्देशकों के लिए खुशखबरी है, जो भोजपुरी फिल्मों को और व्यापक और स्तरीय बनाना चाहते हैं।
भोजपुरी फिल्मों की एक और विशेषता है, जो कि कॉरपोरेट जगत को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है और वह है, कम लागत में अधिक मुनाफा। अमूमन बड़े बजट की एक भोजपुरी फिल्म का निर्माण ढाई से तीन करोड़ के बीच हो जाता है, लेकिन मुनाफा उससे कहीं अधिक होता है। ऐसे में अगर यह कहें कि भोजपुरी फिल्मों के निर्माण से जुड़ना कॉरपोरेट जगत के लिए फायदे का सौदा है, तो शायद गलत नहीं होगा। दरअसल, कंपनियां भोजपुरी फिल्मों में निवेश करने के दौरान आश्वस्त रहती हैं कि उन्हें केवल लाभ ही होने वाला है। भोजपुरी फिल्मों के स्टार अभिनेता मनोज तिवारी कहते हैं, यदि कंपनियां निवेश प्रक्रिया के दौरान केवल अपने प्रोडक्ट पर ध्यान देंगी, तो ऐसे में हमारी फिल्में उपेक्षित हो जाएंगी। इसलिए जरूरी है कि कंपनियां भोजपुरी फिल्मों की बेहतरी के लिए निवेश करें, न कि अपने प्रोडक्ट के लिए! ऐसा नहीं है कि भोजपुरी फिल्मों की पहुंच उत्तर-प्रदेश और बिहार के दर्शकों तक ही है। विदेशों में भी भोजपुरी फिल्में अपने लिए दर्शक तलाशने में सफल रही हैं। फिजी, मॉरीशस, सुरिनाम जैसे देशों में तो भोजपुरी फिल्मों का क्रेज बहुत ज्यादा है। दरअसल, अपने लोगों से दूर हो चुके इन देशों में बसने वाले भारतीय मूल के लोग भोजपुरी फिल्मों के माध्यम से अपनी संस्कृति से जुड़ने का एक बहाना ढूंढने की कोशिश में लगे हैं। ऐसे में भोजपुरी फिल्मों के माध्यम से ही सही, भारतीय कंपनियों को उन देशों में भी अपने उपभोक्ता ढूंढने का मौका मिलेगा। उम्मीद है, भविष्य में भी भोजपुरी फिल्मों में कॉरपोरेट जगत की रुचि ऐसे ही बनी रहेगी और दर्शकों को स्तरीय और गुणात्मक भोजपुरी फिल्में देखने का अवसर मिलेगा।
-मुंबई प्रतिनिधि