
साहित्य से फिल्मों का रिश्ता उतना ही गहरा है, जितना जीवन के साथ मृत्यु का। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जब तक फिल्मों का निर्माण होता रहेगा, साहित्य उससे जुड़ा रहेगा। अब जब साहित्य सिनेमा से जुड़ा रहेगा, तो जाहिर है, कालजयी रचनाएं भी पर्दे पर सिनेमा के रूप में आती रहेंगी। जब बात साहित्य और सिनेमा की संधि की होती है, तो एक कृति की याद या उससे जुड़े प्रसंग जरूर उभर कर सामने आ जाते हैं।
हम बात कर रहे हैं शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कृति देवदास की। देवदास को लेकर शायद ही किसी को संशय हो कि यह फिल्मों के लिए सर्वोत्तम साहित्यिक कृति है। इस कृति को लेकर एक बार फिर चर्चा है और इसकी वजह है कि इस पर दो फिल्में आने वाली हैं। इस बार इसे अपना विषय बनाया है सुधीर मिश्रा और अनुराग कश्यप ने। ये इसी कहानी पर और देवदास और देव डी नाम से फिल्म ला रहे हैं। मिश्रा की फिल्म में देवदास बनेंगे शाइनी आहूजा, पारो के लिए लारा दत्ता और चंद्रमुखी की भूमिका के लिए चित्रांगदा सिंह का चुनाव होने की चर्चा है। देवदास पर फिल्म बनाने की शुरुआत की बात करें, तो सबसे पहले याद आते हैं पी.सी. बरुआ। यह बात सन 1935 की है। फिल्म देवदास सबसे पहले बनी थी बांग्ला में। बरुआ निर्देशित इस फिल्म में देवदास बने थे खुद बरुआ। चंद्रमुखी बनी थीं चंद्रबती देवी और पार्वती का रोल जमुना ने किया था। इस फिल्म को जब अपार सफलता मिली, तब निर्माता ने बरुआ से इसे हिंदी में बनाने को कहा। उसकी तैयारी शुरू हुई। इस बार बरुआ ने सिर्फ निर्देशन की कमान संभाली और देवदास के रोल के लिए गायक-अभिनेता के रूप में चर्चा में आए के.एल. सहगल को चुना। देवदास के रोल में सहगल को चुनने की वजह यह थी कि फिल्म हिंदी में बननी थी और वह जमाना ऐसा था, जब अभिनेता खुद फिल्मों में गीत गाते थे। बरुआ चूंकि असमिया थे और उनकी हिंदी अच्छी नहीं थी, ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठा कि वे हिंदी में गीत कैसे गाएंगे! इसीलिए उन्होंने तब इस रोल के लिए सहगल का चुनाव किया। पार्वती बनीं इस बार भी जमुना और चंद्रमुखी के लिए खूबसूरत हीरोइन राजकुमारी को चुना गया। इस फिल्म को भी अपार सफलता मिली। बांग्ला वर्जन को जहां बंगाल और उससे जुड़े क्षेत्र में ही सफलता मिली, वहीं हिंदी वर्जन का क्षेत्र व्यापक था। फिल्म को चहुंओर कामयाबी मिली। फिल्म की सफलता ने सभी कलाकारों को रातोंरात स्टार बना दिया।
हिंदी में खूब सफलता मिलने के बाद भी आज की तरह इस विषय को तब अन्य निर्माताओं ने नहीं दोहराया। इस बीच साउथ में इस विषय पर फिल्में जरूर बनीं, लेकिन हिंदी में काफी समय बाद यानी 1955 में बिमल राय ने एक बार फिर इस विषय को छुआ। उन्होंने भी विषय की गंभीरता को समझते हुए उस समय के चर्चित कलाकारों को लिया जैसे देवदास की भूमिका के लिए दिलीप कुमार, चंद्रमुखी के लिए वैजयंतीमाला और पारो के रोल के लिए बंगाल की चर्चित हीरोइन सुचित्रा सेन को लिया। चूंकि सुचित्रा सेन की हिंदी अच्छी नहीं थी, इसलिए अभिनेता असित सेन को उन्हें हिंदी सिखाने का काम मिला। सेन इस फिल्म में बिमल राय के सहायक भी थे। इस फिल्म को भी पूर्व की फिल्मों की तरह ही दर्शकों ने खूब पसंद किया। देवदास का रोल करके दिलीप कुमार दर्दीले नायक यानी ट्रेजडी किंग बन गए।
यह उस जमाने के फिल्ममेकर्स की सोच थी कि सफलता पाने वाली इस कृति को किसी ने तुरंत रिमेक नहीं किया। हां, साउथ में जरूर इस कहानी पर फिर कई फिल्में बनीं। 1936 के बाद 1955 में और उसके बाद 2002 में इस विषय पर एक और भव्य फिल्म बनी। इस बार निर्देशक थे संजय लीला भंसाली। इस सहज-सरल और ग्रामीण परिवेश वाली कहानी को भंसाली ने अपनी कल्पना से चामत्कारकी शक्ल में पेश किया। उन्होंने भी उस समय के स्टार कलाकारों यानी देवदास के लिए शाहरुख खान, पारो के लिए ऐश्वर्या राय और चंद्रमुखी के लिए बेहतरीन डांसर-ऐक्ट्रेस माधुरी दीक्षित को चुना। फिल्म रिलीज हुई, तो चारों ओर एक ही शब्द गूंजते सुनाई दिए कि भंसाली ने कमाल की फिल्म बनाई है। यानी यह देवदास भी सुपरहिट हो गई। चूंकि अब रिमेक का जमाना आ गया था, तो दर्शकों की भावनाओं को भुनाने के लिए निर्माताओं ने रिमेक और सिक्वल जैसे खेल शुरू कर दिए। तमाम सफल फिल्मों के सिक्वल और पार्ट-2 बनने लगे। कुछ इसमें सफल हुए, तो कुछ को असफल हुए। सही में फिल्म निर्माण एक मृगतृष्णा है। सफलता मिलेगी, इसकी आस में निर्माता लगातार अपनी कोशिश में लगे रहते हैं और फिल्मों के आने, असफल या सफल होने का क्रम चलता रहता है। आने वाली अनुराग कश्यप निर्देशित और अभय देओल और माही गिल अभिनीत फिल्म देव डी भी देवदास के नए स्वरूप पर आधारित है।
इसी क्रम में एक और फिल्म इसी कहानी पर आएगी सुधीर मिश्रा की। अब देखना यह है कि हिंदी में बनी इस कहानी पर उपरोक्त तीनों फिल्मों की तरह अनुराग कश्यप की देव डी और सुधीर मिश्रा की फिल्म और देवदास (दोनों के बारे में यह चर्चा है कि यह आधुनिक देवदास की कहानी है) भी इतिहास रचती है या नहीं..!
-रतन