करण की फिल्में कमाल: शेखर कपूर

करण की फिल्में कमाल: शेखर कपूर

शेखर कपूर अनोखे निर्देशक हैं। उन्होंने मासूम, मिस्टर इंडिया और बेंडिट क्वीन निर्देशित की। उसके बाद वे विदेश चले गए। वहां उन्होंने कुछ फिल्में निर्देशित कीं। वे भारत लौटे हैं और अब वे यहीं रहने की कोशिश में हैं। अपनी नई फिल्म पानी के प्री-प्रोडक्शन के साथ वे एक लोकप्रिय चैनल के रिअॅलिटी शो के जज भी हैं। उनसे बात हुई सक्रिय निर्देशकों के बारे में, तो उन्होंने जो कहा, प्रस्तुत हैं उसके अंश..

मुझे नीरज पांडे की ए वेडनेसडे अच्छी लगी। अच्छी बात है कि उन्होंने हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे फार्मूले का इस्तेमाल नहीं किया। फिल्म में दर्शकों को बांधे रखने के तत्व हैं और फिर फिल्म कुछ बयां भी करती है।

अनुराग कश्यप का काम मुझे पसंद है। उनकी देव डी और गुलाल दोनों ही अच्छी लगी। उनमें नए सिनेमा की समझ है। पर्याप्त ट्रेनिंग और सही दिशा-निर्देश के अभाव में युवा निर्देशकों का ज्यादा समय राह खोजने में ही बीत जाता है। अनुराग की खोज को अब राह मिल गई है। उम्मीद है अगली फिल्म में वे बड़ा चमत्कार करेंगे।

मुझे सुधीर मिश्रा पसंद हैं। उन्होंने हमेशा अलग किस्म का काम किया है। अपनी हर फिल्म में उन्होंने पहचान छोड़ी है। उनका एक सिग्नेचर है। मुझे आशुतोष गोवारीकर की लगान बहुत अच्छी लगी। एक नया विषय और इतने सारे किरदार.., आशुतोष ने बहुत अच्छी तरह से अपनी बात रखी है। मुझे उनकी जोधा अकबर अच्छी नहीं लगी।

राकेश ओमप्रकाश मेहरा की पिछली फिल्म रंग दे बसंती ज्यादा अच्छी रही। उन्होंने समाज का सुर पकड़ा और अच्छी तरह अपनी फिल्म में पिरो दिया। दिल्ली 6 की कोशिश भी अच्छी लगी। रामगोपाल वर्मा की रंगीला और सत्या को लोग हमेशा याद रखेंगे। वे प्रयोग करते रहते हैं। उनसे उम्मीदें हैं।

मुझे करण जौहर की फिल्में कमाल लगती हैं। पंजाबी में एक कहावत है अक्खां दा सुख..। उनकी फिल्में आंखों को सुख देती हैं। रंग अच्छे होते हैं, लोग अच्छे होते हैं। यह अलग बात है किबाहर आने पर कुछ याद नहीं रहता।

-मुंबई प्रतिनिधि

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