न्यूयार्क: दोस्ती, प्यार, आतंकवाद और अमेरिका

न्यूयार्क: दोस्ती, प्यार, आतंकवाद और अमेरिका

मुख्य कलाकार : जान अब्राहम, कैटरीना कैफ, नील नितिन मुकेश, इरफान खान आदि।

निर्देशक : कबीर खान

तकनीकी टीम : निर्माता- आदित्य चोपड़ा, कहानी- आदित्य चोपड़ा, पटकथा-संवाद- संदीप श्रीवास्तव, गीत- संदीप श्रीवास्तव, जुनैद वासी, संगीत- प्रीतम, पंकज अवस्थी, जूलियस पैकियम

कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।

उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है।

स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है।

एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा। दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।

कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है। कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं।

फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।

रेटिंग: ***

-अजय ब्रह्मात्मज

लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(99) वोट का औसत

average:3.999998
Saving...
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण प्रकाशन लिमिटेड द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2009 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित