
चार अगस्त जन्मदिवस पर विशेष..
इन्दौर। हिन्दुस्तानी फिल्मी के हरफनमौला सितारे किशोर कुमार अपनी जिंदादिली और खिलदडपन के चलते शुरू से ही सबके चहेते थे। उनकी अलमस्त तबीयत के किस्से इन्दौर के क्रिश्चियन कालेज में आज भी चटखारे ले लेकर सुनाये जाते है जहां उन्होंने दो साल तक पढ़ाई की थी।
चार अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश (तब मध्य प्रात) के खंडवा में जन्में किशोर का वास्तविक नाम आभास कुमार गांगुली था। वह मैट्रिक पास कर के इन्टरमीडिएट में पहुंचे तो पिता कुजलाल गांगुली ने उनके भविष्य की चिंता करते हुए इन्दौर के क्रिश्चियन कालेज में दाखिला करा दिया। हालांकि यह बात और है कि किशोर कालेज में अपनी चुलबुली शरारतों और अद्भुत संगीत प्रतिभा के लिये जाने गये।
फिल्म समीक्षक श्रीराम ताम्रकर ने कहा कि इन्दौर में वह कालेज के होस्टल में रहते थे और आमतौर पर शनिवार की शाम अपने गृहनगर खंडवा जाने के लिये रेल में बैठ जाते थे। वह रास्ते में मुसाफिरों के फरमाइशी गाने सुनाकर उनके सफर को सुहाना कर देते। साथ ही हर नये स्टेशन पर डिब्बा बदल लेते थे।
ताम्रकर कहते है कि कालेज में किशोर तडी मारने (पीरियड बंक करने) के लिये कुख्यात थे। वह मित्र मंडली को कालेज परिसर में इमली के पेड़ के नीचे इकट्ठा कर मौसिकी की महफिल जमा लेते। कक्षा के दौरान शिक्षक की मौजूदगी में बैंच को तबला बनाकर बजाने लगते। अपनी इन हरकतों के लिये उन्हें कई मर्तबा डांट भी खानी पड़ी।
उन्होंने कहा कि इसे किशोर की रचनात्मकता कह लीजिये या गीत संगीत के प्रति गजब की दीवानगी कि वह अर्थशास्त्र के गूढ सिद्घांता को भी गीतों में ढाल देते थे। क्रिश्चियन कालेज में इतिहास पढ़ाने वाले स्वरूप वाजपेयी ने कहा कि किशोर वर्ष 1946 से लेकर वर्ष 1948 तक कालेज में पढ़े और फिर इन्दौर छोडकर मुंबई चले गये। लेकिन बताया जाता हे कि तब कैटीन वाले के उन पर पांच रुपये बारह आना बकाया रह गये थे।
वाजपेयी के मुताबिक माना जाता है कि इसी पांच रुपैया बारह आना को उन्होंने अपनी फिल्म चलती का नाम गाड़ी (1958) में गीत का मुखड़ा बना दिया।