कभी अलविदा ना कहना..

कभी अलविदा ना कहना..

13 अक्तूबर पुण्यतिथि पर विशेष..

मुंबई। अभिनय और निर्देशन के साथ-साथ अपनी गायकी से सबको अपना मुरीद बनाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर कुमार ने फिल्म जगत में ऐसा समां बांधा था कि सिने प्रेमी ..जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए.. की तर्ज पर उनकी दीवाने हो गए और उनके जाने के बाद सभी के दिल में उनके ही गाए एक गीत याद आता है ..बड़ी सूनी सूनी है, जिंदगी ऐ जिंदगी..।

बतौर पा‌र्श्वगायक सबसे पहले किशोर कुमार को वर्ष 1948 में बाम्बे टाकिज की फिल्म जिद्दी में सहगलके अंदाज में ही अभिनेता देवानंद के लिए ..मरने की दुआई क्यों मांगू.. गाने का मौका मिला। एक दिन उनके घर पर दादा के नाम से मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन अशोक कुमार से मिलने आए जहां उन्होंने किशोर कुमार को बाथरूम में गाते सुना। उन्हें किशोर कुमार के गाने का अंदाज काफी अच्छा लगा। उन्होने किशोर कुमार को बुलाकर कहा आप के.एल.सहगल की नकल न करें यह बड़े कलाकारों का काम नही है, आप खुद अपना एक अलग अंदाज बनाए। इसके बाद किशोर कुमार ने गायकी का एक नया अंदाज बनाया जो उस समय के नामचीन गायक मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मुकेश और सहगल से काफी अलग था।

वर्ष 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म आराधना के बाद किशोर गायकी की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए। फिल्म आराधना के निर्माण के समय फिल्म संगीतकार सचिन देव वर्मन चाहते थे कि इसके गानों को किसी एक गायक को न देकर उसे किशोर कुमार और मोहम्मद रफी दोनों से गवाया जाए लेकिन बाद में सचिन देव वर्मन की बीमारी के कारण फिल्म अराधना में उनके पुत्र आर.डी.वर्मन ने संगीत दिया। इसमें ..सपनों की रानी कब आएगी तू .. और ..रुप तेरा मस्ताना.. गाना किशोर कुमार ने गाया जो बेहद पसंद किया गया। ..रूप तेरा मस्ताना.. गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। उसके बाद किशोर कुमार ने एक से बढ़कर एक गीत गाकर श्रोताओ को भाव विभोर कर दिया।

मध्यप्रदेश के खंडवा शहर में 4 अगस्त 1929 को एक मध्य वर्गीय बंगाली परिवार में अधिवक्ता कुंजी लाल गांगुली के घर में सबसे छोटे बालक के रुप में जन्में छोटे नटखट आभास कुमार गांगुली उर्फ किशोर कुमार का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे वकालत की तरफ न होकर संगीत की ओर था। के.एल.सहगल के गानों से प्रभावित किशोर कुमार उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे। के.एल. सहगल से मिलने की चाह लिए किशोर कुमार 18 वर्ष की उम्र में मुंबई पहुंचे लेकिन सहगल से मिलने की उनकी मंशा पूरी नही हो पाई। उस समय तक उनके बड़े भाई अशोक कुमार बतौर अभिनेता अपनी पहचान बना चुके थे। उनके बड़े भाई अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर नायक केरूप में अपनी पहचान बनाए लेकिन किशोर कुमार को अदाकारी की बजाए पा‌र्श्व गायक बनने की चाह थी। हांलाकि उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा कभी किसी से नही ली थी। अशोक कुमार की बॉलीवुड में पहचान के कारण उन्हें बतौर अभिनेता काम मिल रहा था। अपनी इच्छा के विपरीत किशोर कुमार ने अभिनय करना जारी रखा जिसका मुख्य कारण यह था कि जिन फिल्मों में वह बतौर कलाकार काम किया करते थे। उन्हे उस फिल्म में गाने का भी मौका मिल जाया करता था। किशोर कुमार की आवाज के.एल.सहगल से काफी हद तक मेल खाती थी।

वर्ष 1951 में बतौर मुख्य अभिनेता उन्होंने फिल्म आन्दोलन से अपने करियर की शुरूआत की लेकिन इस फिल्म से वह अपनी पहचान नहीं बना सके। वर्ष 1953 में प्रर्दशित फिल्म लड़की बतौर अभिनेता उनके कैरियर की पहली हिट फिल्म थी। इसके बाद बतौर अभिनेता भी किशोर कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया। नौकरी (1954), बाप रे बाप (1955), चलती का नाम गाड़ी, दिल्ली का ठग (1958), बेवकूफ (1960), कठपुतली, झुमरू (1961), बाम्बे का चोर, मनमौजी, हाफ टिकट (1962), बावरे नैन, मिस्टर एक्स इन बाम्बे, दूर गगन की छांव में (1964), प्यार किए जा (1966), पड़ोसन, दो दूनी चार (1968) जैसी कई सुपरहिट फिल्में आज भी किशोर कुमार के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती है। किशोर कुमार ने 1964 में फिल्म दूर गगन की छांव में के जरिए निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने के बाद हम दो डाकू (1967) दूर का राही (1972) बढ़ती का नाम गाड़ी (1974) शाबास डैडी (1979), दूर वादियो में कही (1980), चलती का नाम जिंदगी (1982), ममता की छांव में (1982) जैसी कई फिल्मों को निदेर्शित भी किया।

निर्देशन के अलावा उन्होनें कई फिल्मों में संगीत भी दिया जिनमें झुमरू (1961), दूर गगन की छांव में (1964), दूर का राही (1971), जमीन आसमान (1972) और ममता की छांव में (1989) जैसी फिल्में शामिल है। बतौर निर्माता किशोर कुमार ने वर्ष 1964 में दूर गगन की छांव में और वर्ष 1971 में दूर का राही फिल्में भी बनाई। किशोर कुमार बतौर पा‌र्श्वगायक आठ बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सबसे पहले उन्हें वर्ष 1969 में आराधना फिल्म के ..रूप तेरा मस्ताना.. गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1975 में फिल्म अमानुष के गाने ..दिल ऐसा किसी ने मेंरा तोड़ा.. वर्ष 1978 में डॉन के गाने ..खाइके पान बनारस वाला.. वर्ष 1980 में ..हजार राहे जो मुड़ के देखी.. फिल्म थोड़ी सी बेवफाई वर्ष 1982 में फिल्म नमक हलाल के ..पग घूंघरू बांध मीरा नाची थी.. वर्ष 1983 में फिल्म अगर तुम न होते के ..अगर तुम न होते.. वर्ष 1984 में फिल्म शराबी के ..मंजिले अपनी जगह है.. और वर्ष 1985 में फिल्म सागर के ..सागर किनारे दिल ये पुकारे.. गाने के लिए भी किशोर कुमार सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए।

किशोर कुमार ने अपने सम्पूर्ण फिल्मी करियर में 600 से भी अधिक फिल्मों के लिए अपना स्वर दिया। हिन्दी फिल्मों के अलावा उन्होने बंगला,मराठी, आसामी, गुजराती, कन्नड, भोजपुरी और उडि़या फिल्मो में भी अपनी दिलकश आवाज के जरिए श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। वर्ष 1987 में किशोर कुमार ने यह निर्णय लिया कि वह फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वापस अपने गांव खंडवा लौट जायेंगे। वह अक्सर कहा करते थें कि दूध जलेबी खाएगें खंडवा में बस जाएगें, लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रह गया। कभी भी अलविदा ना कहने का अनुरोध करने वाले तथा बुलाने पर लौट आने का वादा करते करने वाले जवां दिल गायक किशोर कुमार अपने इस गीत ..चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना.. की स्वरलहरियों में छोड़कर 13 अक्तूबर 1987 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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