
30 अक्तूबर को पुण्यतिथि पर विशेष..
नई दिल्ली। दो आंखें बारह हाथ, नवरंग और झनक झनक पायल बाजे जैसी फिल्मों में अनूठे तकनीकी प्रयोगों से हिंदी सिनेमा को नई ऊंचाई प्रदान करने वाले मशहूर फिल्म निर्देशक वी शांताराम फिल्मों को सामाजिक बदलाव का जरिया मानते थे और उन्होंने इसकेजरिए मानवता का संदेश देने की कोशिश की।
शांताराम हिंदी सिनेमा के पहले फिल्मकार थे जिन्होंने बच्चों के लिए रानी साहिबा नाम से 1930 में एक फिल्म बनाई। उन्होंने चंद्रसेना में पहली बार ट्राली का प्रयोग किया। उन्होंने 1933 में पहली रंगीन फिल्म सैरंध्री बनाई। भारत में एनिमेशन का इस्तेमाल करने वाले भी वह पहले फिल्मकार थे। वर्ष 1935 में प्रदर्शित हुई फिल्म जंबू काका (1935) में उन्होंने एनिमेशन का इस्तेमाल किया था। उनकी फिल्म डा.कोटनिस की अमर कहानी विदेश में दिखाई जाने वाली पहली भारतीय फिल्म थी।
राजाराम वानकुर्दे शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 को कोल्हापुर में हुआ। किसी तरह की औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं करने वाले शांताराम ने 12 साल की उम्र में अप्रेंटिस के तौर पर रेलवे वर्कशाप में काम करना शुरु किया। इसके बाद उन्होंने बाल गंधर्व की गंधर्व नाटक मंडली में पर्दा खींचने का काम किया।
शांताराम ने फिल्मों की बारीकियां बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म में सीखी। बाबूराव पेंटर ने उन्हें सवकारी पाश (1925) में किसान की भूमिका भी दी। कुछ ही वर्षो में शांताराम ने फिल्म निर्माण की तमाम बारीकियां सीख लीं और निर्देशन की कमान संभाल ली। बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म नेताजी पालकर थी। इसके बाद उन्होंने वी.जी. दामले के.आर.धाईबर, एम.फतेलाल और एस.बी.कुलकर्णी के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी का गठन किया। अपने गुरु बाबूराव की ही तरह शांताराम ने शुरुआत में पौराणिक तथा ऐतिहासिक विषयों पर फिल्में बनाई। लेकिन बाद में जर्मनी की यात्रा एक से उन्हें एक फिल्मकार के तौर पर नयी दृष्टि मिली और उन्होंने 1934 में अमृत मंथन फिल्म का निर्माण किया।
प्रभात फिल्म के लिए उन्होंने तीन बेहद शानदार फिल्में बनाई। उन्होंने 1937 में करुकू (हिंदी में दुनिया ना माने), 1939 में मानुष (हिंदी में आदमी) और 1941 में शेजारी (हिंदी में पड़ोसी) बनाई। शांताराम ने बाद में प्रभात फिल्म को छोड़कर राजकमल स्टूडियो का निर्माण किया। इसके लिए उन्होंने शकुंतला फिल्म बनाई। इसका 1947 में कनाडा की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शन किया गया। शांताराम की बेहतरीन फिल्मों में से एक है डा.कोटनिस की अमर कहानी। यह एक देशभक्त डाक्टर की सच्ची कहानी पर आधारित है जो सद्भावना मिशन पर चीन गए चिकित्सकों के एक दल का सदस्य था।
1957 में उनकी दो आंखें बारह हाथ प्रदर्शित हुई। यह एक साहसिक जेलर की कहानी है जो छह कैदियों को सुधारता है। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था। इसे बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर और सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के लिए सैमुअल गोल्डविन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इस फिल्म का गीत ऐ मालिकतेरे बंदे हम...आज भी लोगों को याद है।
झनक झनक पायल बाजे और नवरंग उनकी बेहद कामयाब फिल्में रहीं। दर्शकों ने इन फिल्मों के गीत और नृत्य को काफी सराहा और फिल्मों को कई कई बार देखा। उनकी आखिरी महत्वपूर्ण फिल्म थी पिंजरा। यह फिल्म जोसफ स्टर्नबर्ग की 1930 में प्रदर्शित हुई क्लासिक फिल्म द ब्ल्यू एंजेल पर आधारित थी। वैसे उनकी आखिरी फिल्म झांझर थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं हो सकी और सात दशकों तक चले उनके शानदार फिल्मी कैरियर का अंत हो गया।
शांताराम को सिनेमा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए 1985 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शांताराम का 30 अक्तूबर 1990 को मुंबई में निधन हो गया।