गुलाम हैदर: फिल्म संगीत के पितामह

गुलाम हैदर: फिल्म संगीत के पितामह

पुण्यतिथि 9 नवंबर के अवसर पर विशेष..

मुंबई। भारतीय फिल्म संगीत जगत में अपनी धुनों के जादू से श्रोताओं को मदहोश करने वाले संगीतकार तो कई हुए और उनका जादू भी श्रोताओं के सर चढ़कर बोला, लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी थे, जो बाद में गुमनामी के अंधेरे में खो गए और आज उन्हें कोई याद भी नहीं करता है। फिल्म संगीत के पितामाह गुलाम हैदर ऐसी ही एक प्रतिभा थे। सुप्रसिद्ध पा‌र्श्वगायिका लता मंगेशकर को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने में गुलाम हैदर का अहम योगदान रहा।

चालीस के दशक में जब लता मंगेशकर फिल्म उद्योग में बतौर पा‌र्श्वगायिका अपनी पहचान बनाने में लगी थीं और उन्हें काम नही मिलता था तब गुलाम हैदर ही एकमात्र संगीतकार थे, जिन्हें लता की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। उन्होंने लता को अपनी फिल्म मजबूर में गाने का मौका दिया और उनकी आवाज में संगीतबद्ध गीत दिल मेरा तोड़ा.., कहीं का न छोड़ा तेरे प्यार ने..श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद ही अन्य संगीतकार भी उनकी प्रतिभा को पहचानकर उनकी तरफ आकर्षित हुए और अपनी-अपनी फिल्मों में लता को गाने का मौका दिया तथा लता को फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाबी मिली। वर्ष 1947 में निर्माता-निर्देशक एस मुखर्जी ने जब फिल्म शहीद के लिए लता को गीत गवाने से इनकार कर दिया तब गुलाम हैदर ने यह भविष्यवाणी की थी कि यह लड़की आगे चलकर इतना अधिक नाम करेगी कि बडे़ से बडे़ निर्माता-निर्देशक और संगीतकार उसे अपनी फिल्म में गाने का मौका देगें। उनकी कही यह बात सच साबित हुई और आज लता मंगेशकर संगीत की दुनिया की सबसे बड़ी हस्ती है।

लता के अलावा सुधा मल्होत्रा और सुरेन्द्र कौर जैसी छुपी हुई प्रतिभाओं को निखारने में गुलाम हैदर के संगीतबद्ध गीतों का अहम योगदान रहा है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद वर्ष 1948 में देश के वीरों को श्रद्धाजंलि देने के लिए उन्होंने फिल्म शहीद के लिए वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो..गीत को संगीतबद्ध किया। देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण यह गीत आज भी महान देशभक्ति गीत के रूप में सुना जाता है और श्रोताओं की आंख को नम कर देता है। वर्ष 1908 में जन्में गुलाम हैदर ने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद दंत चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की थी। इस दौरान उनका रूझान संगीत की ओर भी हुआ और उन्होंने बाबू गणेश लाल से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। दंत चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह दंत चिकित्सक के रूप में काम करने लगे, लेकिन पांच वर्ष के बाद उनका मन इस काम से उचट गया। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि दंत चिकित्सा के क्षेत्र की बजाय संगीत के क्षेत्र में उनका भविष्य अधिक सुरक्षित होगा। इसके बाद वह कलकत्ता की एलेक्जेंडर थियेटर कंपनी में हारमोनियम वादक के रूप में काम करने लगे।

वर्ष 1932 में गुलाम हैदर की मुलाकात निर्माता-निर्देशक ए आर कारदार से हुई, जो उनकी संगीत प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए। कारदार उन दिनों अपनी नई फिल्म स्वर्ग की सीढ़ी के लिए संगीतकार की तलाश कर रहे थे। उन्होंने हैदर से अपनी फिल्म में संगीत देने की पेशकश की, लेकिन अच्छा संगीत देने के बावजूद फिल्म बॉक्स आफिस पर नाकामयाब हुई। इस बीच गुलाम हैदर को डी एम पंचोली की निर्मित एक पंजाबी फिल्म गुल-ए-बकावली में संगीत देने का मौका मिला। वर्ष 1939 में प्रदर्शित इस फिल्म का संगीत श्रोताओं को काफी पसंद आया। फिल्म में नूरजहां की आवाज में गुलाम हैदर का संगीतबद्ध गीत पिंजरे दे विच कैद जवानी..उन दिनों सबकी जुबान पर था। इस फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए और गुलाम हैदर फिल्म इंडस्ट्री में बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।

वर्ष 1941 हैदर के सिने कैरियर का अहम वर्ष साबित हुआ। फिल्म खजांजी में उनके संगीतबद्ध गीतों ने भारतीय संगीत की दुनिया में एक नए युग की शुरुआत कर दी। इससे पहले वर्ष 1930 से 1940 के बीच संगीत, निर्देशक, शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनी पर आधारित संगीत दिया करते थे। गुलाम हैदर इस विचार धारा के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत में पंजाबी धुनों कामिश्रण कर एक अलग तरह का संगीत देने का प्रयास दिया और उनका यह प्रयास काफी सफल भी रहा फिल्म खजांची में उनके संगीतबद्ध गीत इस कदर लोकप्रिय हुए कि पूरे देश में उनकी धूम मच गई। इसके बाद हैदर ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक फिल्मी गीतों को संगीतबद्ध किया।

गुलाम हैदर की जोडी निर्माता डी एम पंचोली के साथ वर्ष 1944 तक कायम रही। इस दौरान उन्होंने चौधरी (1941), खानदान (1942), जमींदार (1942) और पूंजी (1943) जैसी सफल फिल्मों के गीतों को संगीतबद्ध किया। वर्ष 1944 में फिल्म इंडस्ट्री में बेहतर भविष्य की तलाश में वह माया नगरी मुंबई आ गए और चल चल रे नौजवान (1944), फूल (1944), हूमांयू (1945), बैरम खान (1946) और शमा (1946) जैसी फिल्मों के गीतों को को संगीतबद्ध किया। वर्ष 1946 में प्रदर्शित फिल्म शमा में अपने संगीतबद्ध गीत गोरी चली पिया के देश..हम गरीबों को भी पूरा कभी आराम कर दे. और एक तेरा सहारा..में उन्होंने तबले का बेहतर इस्तेमाल किया, जो श्रोताओ को काफी पसंद भी आया। इस बीच उन्होंने बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी फिल्म मजबूर के लिए भी संगीत दिया। पचास के दशक में मुंबई बंदरगाह पर हुए बम विस्फोटों से मुंबई दहल उठी, जिसे देखकर गुलाम हैदर की टीम में शामिल वादकों और संगीतज्ञों ने मुंबई छोड़ कर लाहौर जाने का फैसला कर लिया। हैदर ने उन्हें रोकने की हर संभव कोशिश की। यहां तक कि उन्होंने उन्हें दो महीने का अग्रिम वेतन देने की भी पेशकश की, लेकिन वे काफी भयभीत थे और लाहौर जाने का मन बना चुके थे। इसके कुछ दिन के बाद गुलाम हैदर भी लाहौर चले गए। वहां उन्होंने शाहिदा (1949), बेकरार (1955), अकेली (1951) और भींगी पलके (1952) जैसी फिल्मों के गीतों को संगीतबद्ध किया, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म सफल नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने निर्देशक नाजिर अजमीरी और अभिनेता एस गुल के साथ मिलकर फिल्मसाज बैनर की स्थापना की। फिल्म गुलनार इस बैनर तले बनी गुलाम हैदर की पहली और आखिरी फिल्म साबित हुई और इसके प्रदर्शन के महज तीन दिन बाद ही वह 9 नवंबर 1953 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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