
वी शांताराम के जन्मदिन 18 नवंबर पर विशेष..
नई दिल्ली। हिंदी फिल्म उद्योग जिस समय अपने विकास के शुरूआती दौर में था उसी समय एक ऐसा फिल्मकार भी था जिसने कैमरे, पटकथा, अभिनय और तकनीक में तमाम प्रयोग कर दो आंखें बारह हाथ, डा. कोटनीस की अमर कहानी, झनक झनक पायल बाजे, नवरंग जैसी कई बेमिसाल फिल्में बनाई। इस फिल्मकार वी शांताराम की फिल्में आज भी फिल्म प्रशिक्षुओं के लिए पाठ्यपुस्तक का काम करती हैं।
करीब छह दशक लंबे अपने फिल्मी सफर में शांताराम ने हिंदी तथा मराठी भाषा में कई सामाजिक एवं उद्देश्यपरक फिल्में बनाई और समाज में चली आ रही कुरीतियों पर चोट की। दिलचस्प है कि 18 नवंबर 1901 को कोल्हापुर में पैदा हुए शांताराम यानी राजाराम वांकुरे शांताराम ने बहुत शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, लेकिन उनकी फिल्में सिनेमा के छात्रों के लिए पाठ्यपुस्तक हैं। शांताराम फिल्मों में प्रवेश करने के पहले गंधर्व नाटक मंडली में छोटे-मोटे काम करते थे। बाद में वह बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कंपनी से जुड़ गए, जहां उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीक जानकारियां हासिल की। हालांकि उस दौरान पेंटर ने उन्हें अभिनय के लिए छोटी-छोटी भूमिकाएं भी दी। वह दौर मूक फिल्मों का था और शांताराम ने 1927 में नेताजी पालकर का निर्देशन किया। बाद में उन्होंने तीन चार लोगों के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना की। शुरू में वह पेंटर से काफी प्रभावित रहे और उन्हीं की तरह पौराणिक तथा ऐतिहासिक फिल्में बनाते रहे।
कहा जाता है कि शांताराम एक बार जर्मनी गए, जहां उनकी सिनेमाई दृष्टि को नई दिशा मिली। उसके बाद वह गंभीर और सामाजिक फिल्मों की ओर मुड़े। इस दौरान उन्होंने दुनिया ना माने आदमी, पड़ोसी आदि फिल्में बनाई। वर्ष 1942 में प्रभात कंपनी के पार्टनर अलग हो गए और शांताराम ने उसी वर्ष राजकमल कला मंदिर की स्थापना की। यहां से उनका एक नया और शानदार दौर शुरू हुआ जो अगले कई दशकों तक जारी रहा। इस अवधि में उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में बनाई, जिनमें कई को आज क्लासिक फिल्म माना जाता है। इन फिल्मों में शंकुतला, डा. कोटनीस की अमर कहानी, जीवन यात्रा, झनक झनक पायल बाजे, नवरंग, सेहरा, जल बिन मछली- नृत्य बिन बिजली, दो आंखें बारह हाथ आदि शामिल हैं। हिंदी के अलावा उन्होंने मराठी में भी कई बेहतरीन फिल्में बनाई।
भारत में फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से सम्मानित शांताराम ने अपनी फिल्मों में तकनीक की ओर भी विशेष ध्यान दिया। नृत्य, संवाद, कथानक, संगीत के अलावा तकनीक हमेशा उनकी फिल्मों का सबल पक्ष रहा। उन्होंने 1933 में ही पहली रंगीन फिल्म सैरंध्री बनाने के लिए काफी मेहनत की। फिल्मों के निर्माण के अलावा शांताराम 1970 के दशक में कुछ समय बाल फिल्म सोसायटी के अध्यक्ष भी रहे। उल्लेखनीय है कि शांताराम ने ही पहली बाल फिल्म रानी साहिबा (1930) बनाई थी। बाद के दिनों में बढ़ती उम्र का असर दिखने लगा और वह 88 साल की उम्र में 1990 में इस दुनिया को विदा कर गए। वह इस संसार को भले ही विदा कर गए पर नई पीढ़ी के लिए इतना कुछ छोड़ गए हैं, जो धरोहर है। अब फिल्मों के लिए विदेश भी एक प्रमुख बाजार बन गया है। शांताराम को इस दिशा में भी बेहतरीन ामयाबी मिली। कोटनीस की अमर कहानी और शंकुतला उन पहली फिल्मों में थी जिसका प्रदर्शन विदेशों में भी हुआ। उल्लेखनीय है कि इन फिल्मों को स्वदेश की तरह विदेशों में भी वाहवाही मिली और समीक्षक तथा दर्शकों ने उनकी सराहना की।