
जन्मदिन 23 नवंबर पर विशेष..
नई दिल्ली। हिंदी फिल्मों में गीता दत्त एक ऐसी गायिका थी जिन्होंने संगीत में घुली अपनी रेशमी आवाज के कारण अपना एक खास मुकाम बनाया और अपने जीवन के हर हसीन सितम का दर्द अपने गानों में पिरो दिया। गीता दत्त यानी गीता राय ने उस दौर में सफलतापूर्वक अपने को पार्श्व गायन के मैदान में टिकाए रखा जब लता मंगेशकर की लोकप्रियता आसमान छू रही थी और सुरैया, शमशाद बेगम, आशा भोसले जैसी प्रतिभाशील गायिकाएं कड़ी चुनौतियां पेश कर रही थीं।
फरीदपुर (अब बांग्लादेश) में 23 नवंबर 1930 में एक धनी जमींदार परिवार में गीता दत्ता का जन्म हुआ था। जब वह 12 साल की थी तभी उनका परिवार दादर (मुंबई) आ गया। एक दिन संगीतकार हनुमान प्रसाद ने गीता राय को गाते हुए सुन लिया। गीता की गायन प्रतिभा से आकर्षित प्रसाद ने अपनी फिल्म भक्त प्रहलाद (1946) में गाने का मौका दिया। उस गाने में किशोरी गीता के हिस्से सिर्फ दो पंक्तियां थीं, लेकिन प्रतिभाशाली गीता ने उन दो पंक्तियों में सबको सम्मोहित कर लिया और उन पंक्तियों ने गीता राय की नियति बदल दी। इसके अगले साल ही संगीतकार सचिन देव बर्मन ने अपनी फिल्म दो भाई के लिए गीता राय से एक सोलो गीत गवाया। गीत मेरा सुंदर सपना टूट गया. को बेहद कामयाबी मिली और उस गीत के रिकार्डो की अपार बिक्री हुई। इस गीत ने गीता राय के फिल्मी सफर को नई उड़ान दी और वह उस दौर की चोटी की पार्श्व गायिका बन गई। 1951 में प्रदर्शित बाजी से पहले तक गीता को भजन या दर्द भरे नगमों को गाने के लिए जाना जाता था, लेकिन बतौर निर्देशक गुरुदत्त की इस पहली फिल्म ने लोगों को गायिका के तौर पर गीता दत्त की आवाज के नए अंदाज से परिचित कराया। उनकी आवाज की मादकता और सहजता ने रातोंरात लोगों को उनका दीवाना बना दिया। इस फिल्म के सभी गीत जबर्दस्त हिट हुए, लेकिन तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। इस फिल्म के गीतों की सफलता ने क्लब डांस और मादकतापूर्ण गानों के लिए गीता को पहली पसंद बना डाला। इसी फिल्म के गानों की रिकार्डिग के दौरान गुरुदत्त से उनका प्यार परवान चढ़ा और आखिरकार दोनों 26 मई 1953 को शादी के बंधन में बंध गए।
वहीदा रहमान के साथ गुरुदत्त के पे्रम प्रसंग के चर्चे ने उनके वैवाहिक रिश्ते में तूफान खड़ा कर दिया। गुरुदत्त के साथ शादी टूटने का उनके कैरियर पर भी असर पड़ा। संगीत निर्देशकों ने शिकायतें करनी शुरू कर दी कि वह रिहर्सल या रिकार्डिग के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। उन्होंने रियाज की अनदेखी शुरु कर दी और अकेलेपन को मिटाने के लिए शराब को अपना हमसफर बना लिया। इस बीच 10 अक्टूबर 1964 को गुरुदत्त का निधन हो गया। इसका उन्हें गहरा सदमा लगा। इस बीच आशा भोंसले ने उनकी जगह ले ली। जब तक गीता इस सदमे से उबरीं तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह वित्तीय संकट में फंस चुकी थीं। उन्होंने एक बार फिर से गायकी शुरू करने की कोशिश की। उन्होंने एक बंगाली फिल्म बंधु बरन (1967) में अदाकारी भी की, लेकिन उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। गीता नशे के बंधन में इस कदर जकड़ गई कि उनकी वापसी मुश्किल हो गई और 1972 में वह इस दुनिया से रुखसत हो गई।