
नई दिल्ली। प्रेम को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है चुम्बन। बॉलीवुड में इसकी शुरुआत यूं तो पचहत्तर साल पहले ही हो गई थी, जब 1933 में कर्मा फिल्म में देविका रानी और उनके पति और फिल्म के नायक हिमांशु राय के बीच प्रगाढ़ चुंबन के एक दृश्य को बड़ी शालीनता के साथ पर्दे पर प्रदर्शित किया गया। लेकिन जमाने की बदलती हवाओं के साथ चुंबन की शालीनता पर कामुकता और उद्दामता का ग्रहण लग गया और होड़ लगाई जाने लगी कि कौन कितने अधिक और कितने लंबे समय तक चुंबन के दृश्य करता है। जरूरत नहीं होने पर भी दर्शकों के बीच फिल्म को हिट कराने के फार्मूले के तहत चुंबन के दृश्य ठूंसे जाने लगे।
फिल्म उद्योग के सबसे बड़े शो मैन राजकपूर ने मेरा नाम जोकर फिल्म में रूसी अभिनेत्री क्सीएना राम्बियांकिना के साथ चुंबन का दृश्य इस तर्क केआधार पर किया था कि जमाने में अब खुलेपन की बयार बह रही है और भारतीय दर्शक इतने परिपक्व हो गए हैं कि वे चुंबन के दृश्य को हजम कर सकते हैं। लेकिन अब तो आलम यह है कि मल्लिका सहरावत ने एक फिल्म में चुंबन के इतने अधिक दृश्य किए कि फिल्म का नाम ही यदि चुंबन रख दिया जाता तो भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। सोचा जा सकता है कि जब किसी फिल्म में थोक के भाव में चुंबन के दृश्य होंगे तो उसकी मुग्धता, कोमलता और शालीनता कैसे बरकरार रह सकती है।
राजकपूर ने दर्शकों को अपनी फिल्मों की तरफ खींचने के लिए चुंबन के इस फार्मूले का बाद में भी अपनी कई फिल्मों में इस्तेमाल किया। फिल्म सत्यम् शिवम् सुंदरम् में उन्होंने भीगे बदन में जीनत अमान के साथ शशिकपूर के चुंबन दृश्य को चित्रित किया था। फिल्म राम तेरी गंगा मैली में भी उन्होंने इस फार्मूले को आजमाया और अपने पुत्र राजीव कपूर और नई नायिका मंदाकिनी के बीच प्रणय दृश्य में चुंबन का इस्तेमाल किया। दर्शकों को चुंबन की अलौकिक अनुभूति का कोमल अहसास कराने के बजाय उसे एक आइटम की तरह पेश करके फिल्म को हिट कराने के फार्मूले के तहत इस तरह की होड़ भी लगने लगी कि पर्दे पर चुंबन का दृश्य कितने लंबे समय तक दिखाया जा सकता है। इसी के मद्देनजर राजा हिन्दुस्तानी फिल्म में नायक आमिर खान और नायिका करिश्मा कपूर के बीच चुंबन का एक दृश्य पूरे दस मिनट तक प्रदर्शित किया गया। फिल्मकारों ने प्रेम के इस मधुरस में आक्रामक कामुकता और उद्दामता का अश्लील विष मल्लिका सहरावत, नेहा धूपिया, उदिता गोस्वामी और तनुश्री दत्ता जैसी अभिनेत्रियों और इमरान हाशमी जैसे अभिनेताओं के माध्यम से डाला। मल्लिका और इमरान की तो लगभग सभी फिल्मों में चुंबन का होना एक अनिवार्यता बन गई है। उनकी अभिनीत फिल्मों को बेचने के लिए इन्हें किसिंग क्वीन और किसिंग ब्वाय जैसे टाइटल दे दिए गए।
मल्लिका ने तो चुंबनों की संख्या के विज्ञापनों के साथ प्रदर्शित ख्वाहिश फिल्म से बॉलीवुड में अपने कैरियर का आगाज किया जिसमें उन्होंने नायक को उदारता के साथ धड़ाधड़ चुंबन देकर दर्शकों को अपरिमित चाक्षुष सुख दिया और दर्शकों को भुला दिया कि फिल्म बनाने के लिए कहानी का होना भी जरूरी है। थोक के भाव में दिए गए उनके चुंबनों में नवोढ़ा नायिका का भाव नहीं बल्कि शालीनता की सभी हदों को पार कर जाने वाली प्रौढ़ा नायिका की उद्दामता, आक्रामकता और कामुकता के मिले-जुले भावों का निर्लज्ज प्रदर्शन था। मल्लिका ने बाद में मर्डर फिल्म में भी दर्शकों की रुचि को कुत्सित करने का काम किया। बहाना यह बनाया गया कि दर्शकों की रुचियां अब बदल गई हैं और वे यही चाहते हैं। लेकिन ऐसी फिल्में बनाने वाले महेश भट्ट जैसे निर्देशकों को यह नहीं मालूम कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मनगढंत तर्कोके आधार पर परोसे जा रहे काम कुंठाओं को तुष्ट करने वाले नहीं बल्कि कहानी की आत्मा में रचे बसे मार्मिक और संवेदनशील प्रणय दृश्यों को देखना चाहता है। किसी जगह इस पीढ़ी के प्रतिभावान् कलाकार विनय पाठक ने कहा था कि दयावान् फिल्म में माधुरी दीक्षित और विनोद खन्ना पर फिल्माए प्रगाढ़ चुंबन के दृश्य ने उन्हें बालिग बना दिया। यह बात उन्होंने शायद किसी और संदर्भ में कही थी, लेकिन एक प्रौढ़ अभिनेता और नवागता अभिनेत्री के बीच चुंबन मन की कोमल संवेदनाओं को जगाने के बजाय जुगुप्सा का भाव शायद अधिक पैदा करता है। नेहा धूपिया, उदिता गोस्वामी और तनुश्री दत्ता भी चुंबन की शालीनता को भंग करने की परिपाटी को कायम रखने वाली अभिनेत्रियों की कतार में शामिल हैं। नेहा ने जूली और शीशा जैसी फिल्मों में जमकर अंग प्रदर्शन करने के साथ अशालीन चुंबन की विषवल्लरी को बढ़ाने में योगदान किया। उदिता ने जहर और पाप जैसी फिल्मों के नाम के अनुरूप चुंबन को विषाक्त कर दिया। चुम्बन का यही हाल तनुश्री दत्ता की फिल्मों में भी हुआ जिन्होंने आशिक बनाया आपने जैसी फिल्मों में बोल्ड नायिका का ठप्पा लगवाने के चक्कर में चुंबन को बदनाम किया।
एक नायक इमरान हाशमी हैं, जिनकी कोई भी फिल्म चुंबन के बिना पूरी नहीं होती। इमरान की मुसीबत यह है कि उन पर किसिंग ब्वाय का ऐसा ठप्पा लग गया है कि निर्माता-निर्देशक चाहते हैं कि वह फिल्म में चुंबन का एक दृश्य जरूर करें। ऐसे निर्माता-निर्देशको को इससे सरोकार नहीं है कि फिल्म की कथावस्तु और पटकथा की तरफ ध्यान दिया जाए तथा गीत-संगीत के समुधुर संगम से ऐसी फिल्मों का निर्माण किया जाए जो दर्शकों के मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाएं। इसी संदर्भ में यह बताना भी समीचीन होगा कि बॉलीवुड में कुछ फिल्में ऐसी भी बनी हैं, जिनमें चुंबन का फिल्मांकन उपयुक्त स्थान पर पूरी गरिमा और शालीनता के साथ किया गया है। याद कीजिए मुगले आजम का वह दृश्य जिसमें ाहजादा सलीम बने दिलीप कुमार और अनारकली की भूमिका निभा रही मधुबाला महल के नीरव कुंज में प्रणयकेलि कर रहे हैं। उस दौरान सलीम अनारकली के चेहरे और अधरोष्ठों पर पंख के हल्के स्पर्श से उसकी सुप्त काम भावनाओं को जगाने का प्रयास कर रहे है और पृष्ठभूमि में बडे़ गुलाम अली की आवाज में तानसेन का राग पूरे माहौल पर ऐंद्रजालिक सम्मोहन का गरिमापूर्ण प्रभाव डाले हुए है। भले ही यहां चुंबन का विधान नहीं किया गया है, लेकिन इस दृश्य से दर्शकों को वही आस्वाद मिलता है, जिसका आस्वादन चुंबन के दौरान नायक-नायिका करते हैं।
ऐसा ही एक दृश्य नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म तृष्णा में है जिसमें नाना ने वीतरागी भिक्षु की भूमिका निभाई है। यहां पल्लवी जोशी के साथ उनके चुंबन को सांसारिकता में प्रवेश की घटना के रूप में कहानी की जरूरत की अनुसार प्रस्तुत किया गया है। यह चुंबन भिक्षु ्रको पहली बार भौतिक जगत की चिर अतृप्त आकांक्षा से परिचित कराता है। फिल्म में चुंबन का यह दृश्य कथावस्तु का अभिन्न अंग बनकर आता है और कहीं से भी यह नहीं लगता कि इसे थोपा गया है। कुछ इसी तरह के चुंबन दृश्य रेखा और ओमपुरी अभिनीत बासु भट्टाचार्य की फिल्म आस्था में भी दिखाए गए थे जिनमें ये दृश्य कहानी की निहायत जरूरी मांग बनकर आए थे और इनसे कथा प्रवाह में किसी तरह की शिथिलता भी नहीं पड़ी थी।