..और शांताराम ने प्रभात छोड़ दी

..और शांताराम ने प्रभात छोड़ दी

भारतीय फिल्म इतिहास में मील का पत्थर कहे जाने-वाले निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम ने एक दिन कुछ ऐसा कर दिया कि उन्हें प्रभात फिल्म कंपनी छोड़नी पड़ी। क्यों..?

भारतीय फिल्मोद्योग के दिग्गज निर्देशकों में वी. शांताराम का नाम लिया जाता है। कुली के रूप में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी से अपना करियर आरंभ करने वाले शांताराम बाद में अभिनेता बने और फिर प्रसिद्ध प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना में सर्वाधिक योगदान भी दिया। उनके निर्देशन में कंपनी ने अच्छी ख्याति पाई। शांताराम ने इसी कंपनी के जरिए कई यादगार व भव्य फिल्में दो आखें बारह हाथ, अमृत मंथन, अमर ज्योति, दुनिया न माने, आदमी और पड़ोसी बनाई। ये ऐसी फिल्में हैं, जो इस देश के फिल्म इतिहास की स्वर्णिम कृति मानी जाती हैं।

शांताराम ने पुणे के प्रभात स्टूडियो में जो आखिरी फिल्म बनाई, वह थी शेजारी। यह पड़ोसी का मराठी रूपांतर थी। इस मराठी फिल्म में शांताराम ने वह भूमिका हीरोइन जयश्री को दी, जो पड़ोसी में उन्होंने अनीत खातून को दी थी। फिल्म के निर्माण के दौरान शांताराम और जयश्री के रिश्तों को लेकर कनबतियां शुरू हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि शांताराम विवाहित थे और प्रभात नगर में पत्नी के साथ रह रहे थे। प्रभात में अनुशासनहीनता को संचालक सहन नहीं करते थे। शांताराम भी संचालकों में से एक थे, लेकिन उन्हें भी विवाहित होने पर एक कुंवारी अभिनेत्री से रिश्ते जोड़ने की अनुमति नहीं थी। लिहाजा उनसे यह कहा गया कि वे जयश्री से अपनी मित्रता समाप्त करें या प्रभात छोड़ दें। उन दिनों शांताराम जयश्री पर इतने मुग्ध थे कि उन्होंने प्रभात को अलविदा कहने में तनिक भी देर नहीं लगाई।

वे पुणे से मुंबई आ गए। राजकमल कला मंदिर नाम से अपना प्रोडक्शन यूनिट स्थापित किया। जयश्री से विवाह कर उन्हें फिल्म शकुंतला की हीरोइन बनाया और चंद्रमोहन को दुष्यंत। फिल्म शकुंतला ने गोल्डेन जुबली मनाई।

-बच्चन श्रीवास्तव

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