गीतों के लिए ही बनी थीं गीता दत्त

गीतों के लिए ही बनी थीं गीता दत्त

पुण्यतिथि 20 जुलाई पर विशेष..

नई दिल्ली। चहक भरी आवाज और गाने के दिलकश अंदाज की मलिका गीता दत्त भारतीय फिल्म संगीत में पश्चिमी छुअन को सुर देने वाली एक ऐसी फनकार थीं, जिन्हें हर तरह के गीत गाने में महारत हासिल थी। भजन गायिका के तौर पर शुरुआत करने वाली गीता दत्त फिल्म बाजी के गीतों में अपनी मादक आवाज का जादू जगाकर जल्द ही संगीत जगत पर छा गइ और उस जमाने की नई पीढ़ी की पहली पसंद बनकर उभरीं।

हिन्दी फिल्मों में हर तरह के गीत गाने की क्षमता का प्रदर्शन शायद सबसे पहले गीता ने ही किया। चाहे रूमानी गीत हों, तेज संगीत वाले गाने हो, अध्यात्मिक गीत हों या फिर गम भरे नग्मे हों, इस फनकार ने हर गीत को डूबकर गाया और सुनने वालों को मंत्रमुग्ध किया। गीता ने अपने कॅरियर में करीब 1200 हिन्दी गाने गाए। आवाज में बंगाली खनक उन्हें अपने जमाने की दूसरी गायिकाओं से अलग करती थी। संगीत निर्देशक एस.डी.बर्मन ने उनकी आवाज की इस खासियत का देवदास और प्यासा में अच्छा इस्तेमाल किया और इन फिल्मों के गाने बहुत पसंद किए गए। प्यासा का गीत आज सजन मोहे अंग लगा लो बंगाली कीर्तन के हिन्दी रूपांतरण का सबसे उपयुक्त उदाहरण है। शुरुआत में गीता को सिर्फ भजन और गम भरे गीत गाने के लिए ही जाना जाता था, लेकिन बाजी में जैज संगीत वाली पश्चिमी धुनों पर गजब के गीत गाकर गीता ने दुनिया को अपनी बहुमुखी प्रतिभा का एहसास कराया। अपेक्षाकृत तेज और ज्यादा वाद्य यंत्रों की धुनों से तालमेल बैठाकर अपनी आवाज का जादू चलाने वाली गीता दत्त जल्द ही 1950 के दशक की शीर्ष गायिकाओं शमशाद बेगम और लता मंगेशकर के टक्कर की गायिका बन गई। ओ.पी.नैयर के संगीत निर्देशन में गीता की गायकी और निखरी।

मौजूदा बांग्लादेश के फरीदपुर में 23 नवम्बर 1930 को एक जमींदार परिवार में जन्मी गीता घोष रॉय चौधरी का परिवार वर्ष 1942 में मुंबई में बस गया। संगीत निर्देशक हनुमान प्रसाद ने उनकी आवाज सुनी। वह उनसे बहुत प्रभावित हुए। प्रसाद ने वर्ष 1946 में उन्हें भक्त प्रह्लाद फिल्म में एक कोरस गीत में मौका दिया। उस गीत में गीता को सिर्फ दो पंक्तियां गाने को मिलीं। बाद में उन्हें फिल्म दो भाई में पहली बार बड़ा ब्रेक मिला। गीता दत्त की गायकी काफी हद तक उनकी निजी जिंदगी से प्रभावित थी। बाजी फिल्म में गाने के दौरान उनकी मुलाकात उस जमाने के मशहूर निर्देशक गुरुदत्त से हुई। बाद में दोनों एक दूसरे से शादी के बंधन में बंध गए। शादी के बाद के शुरुआती वषो में गीता ने खासकर गुरुदत्त की फिल्मों में बेहतरीन गीत गाए। वर्ष 1947 से 1959 तक का वक्त उनके लिए सबसे सुनहरा दौर साबित हुआ। इस दौरान उन्होंने हिन्दी फिल्म संगीत जगत को अनेक लोकप्रिय गीत दिए जिनमें खासतौर पर बाबू जी धीरे चलना, जा-जा बेवफा, हूं अभी मैं जवां और ए लो मैं हारी पिया जैसे मकबूल नग्मे शामिल हैं।

वर्ष 1964 में गुरुदत्त के निधन के बाद गीता को परेशानियों ने घेर लिया और कुछ वक्त के लिए गायन से उनका नाता लगभग टूट गया। अपने करियर के आखिरी दौर में गीता दत्त ने फिल्म अनुभव के गीतों को इतनी खूबसूरती से गाया कि उनके कट्टर आलोचकों को भी उनकी तारीफ करनी पड़ी। साथ ही उन्होंने संगीत की दुनिया को एक बार फिर दिखा दिया कि वह गीत के लिए ही बनी हैं। मखमली और जीवंत आवाज से सुनने वालों को मुग्ध करने वाली इस कलाकार ने महज 41 साल की उम्र में 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया से विदा ले ली।

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