नई दिल्ली। सिनेमेटोग्राफर के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले गोविन्द निहलानी का कहना है कि सिनेमेटोग्राफी और लाइटिंग सिनेमा के दो अत्यंत महत्वपूर्ण आधार हैं। सिनेमेटोग्राफी जहां फिल्मों को मूर्त रूप देती है, वहीं लाइटिंग से फिल्मों में एक अजीब अनुभूति पैदा होती है। सिनेमेटोग्राफर के अतिरिक्त निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक गोविन्द निहलानी ने कहा कि फिल्म में सभी चीजों का अपना योगदान है, लेकिन सिनेमटोग्राफी और लाइटिंग उन्हें काफी पसंद हैं। सिनेमेटोग्राफी उन्हें इसलिए पसंद है, क्योंकि उन्होंने इसी के जरिए फिल्मों में अपना करियर शुरू किया और इसी ने आज उन्हें निर्माता-निर्देशक तथा पटकथा लेखक के मुकाम तक पहुंचाया है।
19 अगस्त 1940 को कराची में जन्मे निहलानी का परिवार 1947 में देश के बंटवारे के बाद भारत आ गया था। उन्होंने फिल्मों में काम करने का मन बनाया और इसके लिए बेंगलूर के श्री जया चामराजेंद्र पॉलीटेक्निक से 1962 में सिनेमेटोग्राफी में स्नातक की उपाधि हासिल की। निहलानी की पहली फीचर फिल्म शांत कोर्ट चालू है थी जिसकी उन्होंने सिनेमेटोग्राफी करने के साथ ही सह निर्देशन भी किया। उसके बाद वह मशहूर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के साथ जुड़ गए और उनके साथ उन्होंने बहुत से वृत्तचित्र करने के साथ ही 10 फीचर फिल्में भी कीं। गोविन्द निहलानी को उस समय अत्यंत खुशी हुई जब 1979 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ छायांकन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। उनका कहना है कि इस पुरस्कार से उनका उत्साह और भी अधिक बढ़ गया। निर्देशक सिनेमेटोग्राफर के रूप में उनकी सबसे पहली फिल्म आक्रोश थी, जिसे 1981 में नई दिल्ली में आयोजित भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में गोल्डन पीकॉक अवार्ड से नवाजा गया। इसी साल निर्देशक रिचर्ड एटनबरो ने उन्हें दूसरे नंबर के निर्देशक सिनेमटोग्राफर के रूप में अपने साथ फिल्म गांधी के निर्माण के साथ जोड़ लिया।
उनकी नौवीं फिल्म दृष्टि को 1990 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म के रूप में चुना गया। महाश्वेता देवी के बंगाली उपन्यास हजार चौरासी की मां पर बनी निहलानी की फिल्म को 1997 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। तक्षक (2000), देहम (2001) और देव (2004) जैसी दर्जनों फिल्मों ने निहलानी को काफी ख्याति दिलाई। निहलानी ने कहा कि सिनेमा का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। आज यह सिर्फ दृश्य माध्यम ही नही, बल्कि दृश्य और श्रव्य माध्यमों का संगम बन चुका है जो दर्शकों के दिलों पर गहरा प्रभाव छोड़ने में सफल साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि सिनेमेटोग्राफर के नजरिए से जूम लेंस का भी फिल्म क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जिससे फिल्म में जान आती है और रोचकता के साथ ही दर्शकों में जोश, जुनून और भावनाएं भी उमड़ती हैं। भविष्य की योजनाओं के बारे में उन्होंने कहा कि वह इसके बारे में जल्द ही खुलासा करेंगे।