सहज अभिनय के पर्याय थे अशोक कुमार

सहज अभिनय के पर्याय थे अशोक कुमार

13 अक्तूबर को जन्‍मदिन पर विशेष..

नई दिल्ली। हिन्दी फिल्मों के आंरभिक दौर के नायकों में अशोक कुमार एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने प्रचलित पारसी थिएटर के संस्कारों को ताक पर रखते हुए अपने सहज अभिनय के दम पर स्टारडम खड़ा किया और कभी अपने को किसी छवि से बंधने नहीं दिया।

दिलचस्प है कि शुरूआती दौर में फिल्म जगत में मौजूद रहने के बावजूद अशोक कुमार पर्दे पर अभिनय के पक्ष में नहीं थे। इसीलिए जब उन्हें जीवन नैया फिल्म में अभिनय का मौका मिला तो उन्होंने बहुत ही बेमन से इसमें काम शुरू किया। दरअसल अशोक कुमार की रूचि फिल्म के तकनीकी पक्ष में थी और वह इसी में सफलता हासिल करना चाहते थे।

किसी काम को हाथ में लेने के बाद उसे पूरी तल्लीनता से करना अशोक कुमार की फितरत थी। इसी वजह से जब उन पर अभिनय की जिम्मेदारी आई तो उन्होंने इसे भी पूरी गंभीरता से लिया। वह अभिनय में इतनी जल्दी रच बस गए कि लगा मानों यह उनका जन्मजात पेशा था।

इस बात का प्रमाण उनकी शुरूआती फिल्म अछूत कन्या थी। इसमें अशोक कुमार अपने दौर की प्रख्यात अभिनेत्री देविका रानी केसाथ काम कर रहे थे लेकिन उनके अभिनय को देखकर कहीं भी यह नहीं लगता था कि वह कोई नौसिखिया अभिनेता हों। इसके बाद अशोक कुमार की देविका रानी के साथ इज्जत, सावित्री और निर्मला फिल्में आई। बाद में अशोक कुमार की सुपरहिट फिल्म मैं बन का पंछी आई जिसका एक गाना आज भी उनकी आवाज में सुनने पर मधुर लगता है।

एक स्टार के रूप में अशोक कुमार की छवि 1943 में आई किस्मत फिल्म से बनी। पर्दे पर सिगरेट का धुंआ उड़ाते अशोक कुमार ने राम की छवि वाले नायक के उस दौर में इस फिल्म के जरिए एंटी हीरो के पात्र को निभाने का जोखिम उठाया। यह जोखिम उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ और इस फिल्म ने सफलता के कई कीर्तिमान बनाए। इसके बाद 1949 में मधुबाला केसाथ आई महल भी काफी सफल साबित हुई।

अपने दौर की अन्य अभिनेत्रियों के साथ-साथ अशोक कुमार ने मीना कुमारी के साथ भी कई फिल्मों में अभिनय किया जिनमें पाकीजा, बहू बेगम, एक ही रास्ता, बंदिश, आरती आदि शामिल हैं।

भागलपुर में 13 अक्तूबर 1911 में जन्मे दादा मुनि अशोक कुमार ने कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कालेज से पढ़ाई की थी। उनके पिता कुंजलाल गांगुली मध्य प्रदेश के खंडवा में वकील थे। अशोककुमार के दो छोटे भाई अनूप कुमार और किशोर कुमार भी बाद में फिल्मों में आए। दरअसल इन दोनों को फिल्मों में आने की प्रेरणा भी अशोक कुमार से ही मिली।

अशोक, अनूप और किशोर कुमार ने चलती का नाम गाड़ी में काम किया। इस कामेडी फिल्म में भी अशोक कुमार ने बड़े भाई की भूमिका निभाई थी। फिल्म में मधुबाला ने भी काम किया था। किशोर कुमार ने अपने कई साक्षात्कारों में यह बात स्वीकार की थी कि उन्हें न केवल अभिनय बल्कि गाने की प्रेरणा भी अशोक कुमार से मिली थी क्योंकि अशोक कुमार ने बचपन में उनके भीतर बालगीतों के जरिए गायन के संस्कार डाले थे।

अशोक कुमार ने बाद के जीवन में चरित्र अभिनेता की भूमिकाएं निभानी शुरू कर दी थीं। इन भूमिकाओं में भी अशोक कुमार ने जीवंत अभिनय किया। अशोक कुमार गंभीर ही नहीं हास्य अभिनय में भी महारथ रखते थे। विक्टोरिया नंबर 203 फिल्म हो या शौकीन, अशोक कुमार ने हर रोल में कुछ नया पैदा करने का प्रयास किया।

अभिनेता ही नहीं अशोक कुमार ने कुछ फिल्मों में विलेन का रोल भी किया। इनमें देवानंद और वैजयंती माला अभिनीत ज्वैल थीफ फिल्म प्रमुख है।

फिल्म ही नहीं अशोक कुमार ने टीवी में भी काम किया। भारत के पहले सोप ओपेरा हम लोग में उन्होंने सूत्रधार की भूमिका निभाई। सूत्रधार के रूप में अशोक कुमार हम लोग के एक अभिन्न अंग बन गए। दर्शक आखिर में की जाने वाली उनकी टिप्पणी का इंतजार करते थे क्योंकि वह टिप्पणी को हर बार अलग तरीके से दोहराते थे। उन्होंने बहादुरशाह जफर सीरियल में भी अविस्मरणीय भूमिका निभाई थी।

अशोक कुमार के अभिनय की चर्चा उनकी आशीर्वाद फिल्म के बिना अधूरी ही रहेगी। इस फिल्म में उन्होंने एकदम नए तरह के पात्र को निभाया। इस फिल्म में उनका गाया गीता रेलगाड़ी रेलगाड़ी.. काफी लोकप्रिय हुआ था। इस फिल्म के लिए उन्हें श्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था।

एक अच्छे अभिनेता होने के कारण अशोक कुमार को तमाम पुरस्कारों से नवाजा गया जिनमें भारतीय फिल्म जगत का शीर्ष एवार्ड दादा साहब फाल्के पुरस्कार शामिल है। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। इस महान अभिनेता का 10 दिसंबर 2001 को निधन हुआ।

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