गांधी पर बनी फिल्मों ने जमकर बटोरी सराहना

गांधी पर बनी फिल्मों ने जमकर बटोरी सराहना

नई दिल्ली। गांधी वह नाम है, जो सिद्घांतों, विचारों, प्रतिमाओं तस्वीरों, साहित्य, किताबों और मैडम तुसाद के संग्रहालय के साथ-साथ फिल्मों पर भी अपना करिश्मा दिखाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर बनी फिल्मों ने बॉक्स आफिस पर सफलता हासिल की और विश्व को अहिंसा के इस पुजारी के जीवन के विविध पहलू दिखाकर जमकर सराहना बटोरी।

बॉक्स आफिस का गणित बताता है कि गांधी पर आधारित फिल्में दर्शकों को हमेशा पसंद आई। निर्माता निर्देशक ने जब भी कहानी और अभिनय पर ध्यान देते हुए पूरी ईमानदारी से फिल्म बनाई, उसने सीधे दर्शकों के दिल पर असर किया। आज बापू का सत्याग्रह आंदोलन लंबा सफर तय कर चुका है। हिंदी सिनेमा में एक-एक दशक अलग-अलग तरह की फिल्मों के लिए याद किया जाता है, लेकिन हर दशक में एक न एक बार पहले पर्दे ने बापू को पेश किया। चाहे वह लगे रहो मुन्नाभाई हो या गांधी माई फादर हो या फिर गांधी ही क्यों न हो।

निर्देशक राजकुमार हीरानी के मुन्नाभाई ने गांधीगिरी के माध्यम से बापू के दर्शन को बेहद सरल सहज, लेकिन असरदार तरीके से लोगों के सामने रखा। साइबर युग में बापू का संयम बरतने का सिद्घांत 100 करोड़ से अधिक आबादी पर छा गया और फिल्म ने बॉक्स आफिस पर करोड़ों की कमाई की। गांधीगिरी का जादू इस कदर लोगों को भाया कि उन्होंने अपने निजी जीवन में भी इसे उतारने की कोशिश की। खबरें मिलती गई कि कहीं यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को जुर्माने के बजाय फूल पेश किए गए तो कहीं सड़क पर कचरा फेंकने वाले को धन्यवाद कह कर कचरा उठा कर कूड़ेदान में डाला गया।

हीरानी से पहले और बाद के निर्माता निर्देशकों ने भी गांधी के मंत्र को सेल्यूलाइड की कसौटी पर कसा। किसी को कामयाबी कमाई के रूप में मिली, तो किसी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना के रूप में। बापू पर सन 1982 में एक विदेशी फिल्मकार सर रिचर्ड एटनबरो ने फिल्म गांधी बनाई। इसमें अहिंसा के पुजारी का किरदार भी एक विदेशी कलाकार बेन किंग्सले ने निभाया, लेकिन फिल्म का तानाबाना इतनी बारीकी और खूबसूरती से बुना गया कि भारतीय दर्शकों को भी यह फिल्म अपनी सी लगी और इसमें विदेशीपन का कोई अहसास नहीं था। भारतीयता और देशप्रेम से ओतप्रोत एटनबरो की गांधी ने आस्कर सहित ढेरों पुरस्कार अपने नाम किए और सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर बन गई। आज यह एक कालजयी फिल्म मानी जाती है।

प्रख्यात निर्माता निर्देशक श्याम बेनेगल ने रजत कपूर को लेकर द मेकिंग आफ महात्मा गांधी से महात्मा तक बनाई। लीक से हट कर फिल्में बनाने वाले बेनेगल ने अपने इस सराहनीय प्रयास में गांधी केसत्य के प्रयोगों की झलक दिखाई। बॉक्स आफिस पर यह फिल्म हिट नहीं रही, लेकिन इसे देश विदेश में लोगों ने खूब पसंद किया। गांधी की चर्चा सरदार और जवाहर में भी हुई। वीर सावरकर द लीजेंड आफ भगत सिंह 23 मार्च 1931 शहीद फिल्मों में भी गांधी को एक अलग नजरिये से पेश किया गया। हे राम में कमल हासन ने गांधी की हत्या से जुड़े कुछ पहलुओं पर रोशनी डाली।

जाहनू बरूआ की मैंने गांधी को नहीं मारा में अनुपम खेर के अंत‌र्द्वन्द्व और अपराध बोध में जीते किरदार के जरिए गांधी को लेकर नई बहस शुरू हुई। इसे भी लोगों ने पसंद किया। राष्ट्रपिता बापू बा और उनके बड़े बेटे हरिलाल के संबंधों को अनिल कपूर ने गांधी माई फादर में उकेरा। महात्मा वर्सेस, गांधी नामक नाटक पर बनी यह फिल्म पिता गांधी और उनके बेटे हरिलाल के भावनात्मक एवं तनावपूर्ण रिश्तों के उस पक्ष को दिखाती है, जहां पूरे देश के मुंह से बापू के लिए निकलती राष्ट्रपिता की ध्वनि सुनाई देती है। अक्सर कहा जाता है कि गांधी को समझने की जितनी ज्यादा कोशिश की जाए वह उतने ही गूढ़ होते जाते हैं। बिल्कुल इसी तरह गांधी का रहस्यमय व्यक्तित्व फिल्मों में अलग-अलग तरीके से दिखाया गया, लेकिन इसमें झांकने की जितनी कोशिश की गई इसकी गहराई उतनी बढ़ती गई। पर सबसे अहम बात यह है कि अहिंसा के पुजारी को जब भी जिस रूप में भी सेल्युलाइड के पर्दे पर दिखाया गया इसकी सराहना ही हुई।

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