भारतीय सिनेमा ने किया डिजिटल प्रणाली का रूख

भारतीय सिनेमा ने किया डिजिटल प्रणाली का रूख

नई दिल्ली। भारत में फिल्मों के प्रदर्शन के लिए मल्टीप्लेक्सों के आगमन से जहां सिनेमाघरों के रंग रूप बदले हैं, वहीं अब तकनीक भी बदलने जा रही है और इन मल्टीप्लेक्सों में भारी भरकम प्रोजेक्टरों के स्थान पर डिजिटल सिनेमा प्रणाली को स्थापित किया जा रहा है। सिनेमा घरों में प्रोजेक्टरों के स्थान पर डिजिटल सिनेमा प्रणाली अपनाने का विचार अनायास ही नहीं आया। सत्तर के दशक से ही किसी ऐसी प्रणाली की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी जिससे सिनेमा को निगेटिव फिल्म और रील पर उतारने और फिर उसे प्रोजेक्टर के जरिए पर्दे पर पेश करने की जटिल प्रक्रिया से बचा जा सके।

फिल्म निर्माता संदीप मारवाह ने कहा कि सत्तर के दशक की यादगार फिल्म शोले को कौन भूल सकता है जिसे देखने के लिए सिनेमाघरों पर दर्शकों का हूजूम उमर पड़ा था, लेकिन उस समय फिल्मों के प्रदर्शन के लिए रील की कमी पड़ गई थी। इसके कारण फिल्म का एक हिस्सा एक सिनेमाघर में दिखाने के बाद उसे दूसरे सिनेमाघर में भेजा जाता था। छोटे शहरों में सिनेमाघरों को तो और भी मुश्किल का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि आज इस परेशानी से बचने के लिए सिनेमाघर विशेष तौर पर मल्टीप्लेक्सों ने डिजिटल सिनेमा प्रणाली का रूख किया है। इसके कारण न केवल फिल्मों का वितरण आसान और सस्ता हो जाएगा, बल्कि 70-80 किलोग्राम के रीलों को लैब से सिनेमाघरों तक ले जाने की परेशानी से भी बचा जा सकेगा।

मारवाह ने कहा कि किसी डिजिटल फाइल को एक हार्ड ड्राइव से दूसरे हार्ड ड्राइव में काफी आसानी से और कम खर्च में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त फिल्मों को कंप्यूटर पर रिकार्ड करने से स्टूडियों और थिएटरों को बाजार की गतिविधियों के अनुरूप कदम उठाने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि अगर कोई फिल्म असफल होती है तो उसे आसानी से हटाया जा सकता है और किसी फिल्म के अचानक हिट होने पर एक माउस को क्लिक कर उसे पर्दे पर पेश किया जा सकता है। बॉलीवुड के प्रसिद्ध तकनीशियन बाला सुब्रमण्यम ने कहा कि डिजिटल फिल्म प्रणाली के फायदे तो हैं, लेकिन इसकी कुछ खामियां भी है। एक तरफ मुवी प्रोजेक्टर जहां कई दशकों तक सुरक्षित रह सकते हैं, वहीं डिजिटल फिल्मों को रिकार्ड करने वाली प्रणाली तीन वर्षो से अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह सकती है। उन्होंने कहा कि एक पारंपरिक प्रोजेक्टर फिल्म के रखरखाव में काफी कम खर्च आता है, लेकिन डिजिटल फिल्म प्रणाली के रखरखाव पर भारी खर्च आता है क्योंकि सम्पूर्ण प्रणाली की देखरेख के लिए अलग से आईटी विभाग गठित करने की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल फिल्म प्रणाली के जरिए पेश फिल्मों की गुणवत्ता तुलनात्मक रूप से अच्छी नहीं होती है। डिजिटल प्रणाली के जरिए पेश चित्रों में प्रोजेक्टर से पेश चित्रों की तुलना में कम गहराई और स्पष्टता होती है और ध्वनि की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती। डिजिटल सिनेमा प्रणाली वास्तव में एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए थिएटर में फिल्मों को हार्ड डिस्क अथवा उपग्रह जैसे इलेक्ट्रानिक प्रसारण माध्यम से पहुंचाए जाते है। भारत में यूनाइटेड फिल्म आर्गेनाइजर्स (यूएफओ) ने बाजार की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए फिल्मों के वितरण और प्रदर्शन प्रणाली में बदलाव के मद्देनजर डिजिटल फिल्म प्रणाली पेश की। यूएफओ ने एमपीईजी-4 प्रोद्योगिकी पर आधारित डिजिटल सिनेमा प्रणाली पेश की जिससे फिल्मों के प्रदर्शन की प्रक्रिया को और लचीला बनाया जा सके तथा दक्षता में वृद्धि के साथ लागत को कम किया जा सके।

डिलाइट थिएटर के महाप्रबंधक एम के महरोत्रा ने कहा कि थिएटरों के सर्वर में यूएफओ प्रणाली के जरिए दर्ज फिल्मों से सिनेमाघर मालिकों को अलग-अलग समय में अलग अलग फिल्मों के प्रदर्शन का विकल्प होता है। फिल्मों के प्रदर्शन का भुगतान भी प्रति शो प्रदर्शन के आधार पर तकनीकी माध्यम से ही वसूला जाता है। उन्होंने कहा कि थिएटर प्रबंधक बिल का भुगतान यूएफओ से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त कर एक वैध भुगतान पते के माध्यम से कर सकते हैं। फिल्मों के रिलीज आर्डर के आधार पर सिनेमा घर मालिकों को लाइसेंस प्राप्त होता है और सिनेमैनेजर उपकरण के माध्यम से नेटवर्क को जोड़ा जाता है। इसके बाद थिएटरों को वीसैट लिंक के जरिए फिल्मों को सम्प्रेषित किया जाता है। महरोत्रा ने कहा कि डिजिटल प्रणाली से फिल्मों के प्रदर्शन से पारंपरिक प्रोजेक्टर की तुलना में 30 प्रतिशत खर्च कम आता है।

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