
नई दिल्ली। सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष व अपने समय की प्रख्यात अभिनेत्री शर्मिला टैगोर का कहना है दर्शकों को खींचने के लिए फिल्मों में सेक्स व हिंसा के दृश्य दिखाना फिल्मकारों का सटीक फार्मूला है। शर्मिला कहती हैं कि यदि इस तरह के दृश्य फिल्मों की पटकथा से मेल खाते हैं तो वह इन पर कैंची नहीं चलाती हैं।
एक साक्षात्कार के दौरान शर्मिला ने कहा, सेक्स और हिंसा बिकते हैं। हर कोई शेक्सपीयर या उत्कृष्ट निर्देशक नहीं हो सकता और ना ही इम्तियाज अली हो सकता है। जिनकी फिल्म जब वी मेट ने साफ-सुथरी फिल्म होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी थी। उन्होंने कहा, कुछ लोग साफ-सुथरी फिल्म बनाते हैं और उसमें एक आयटम गीत डाल देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस तरह का गीत दर्शकों को खींचने में कामयाब रहेगा और ऐसा ही होता है। आप उन्हें दोष नहीं दे सकते क्योंकि आखिरकार पैसा कमाने के लिए ही फिल्म बनाई जाती है। कुछ महीने पहले समलैंगिक कार्यकर्ता श्रीधर रंगायन ने समलैंगिकों के समुदाय पर पिंक मिरर नाम से फिल्म बनाई थी। तब उन्होंने कहा था कि सेंसर बोर्ड को अपने नियमों में बदलाव लाना चाहिए। लेकिन शर्मिला इस बात से इत्तिफाक नहीं रखती हैं।
हाल ही में हुए कान्स फिल्म समारोह में ज्यूरी सदस्य रहीं 62 वर्षीय शर्मिला कहती हैं, मैं श्रीधर के वक्तव्य से सहमत नहीं हूं। हमारे पास नियम हैं लेकिन हर कोई उन्हें अपने ढंग से समझता है। सेंसर बोर्ड के सभी सदस्य भारत व भारतीय संवेदनशीलता को समझते हैं। शर्मिला कहती हैं कि यदि कोई दृश्य पटकथा से मेल खाता है तो हम उसे अलग नहीं करते। उन्होंने कहा, जरूरी नहीं है कि हम दृश्य को हटाएं लेकिन हम उसे विभिन्न श्रेणियों के प्रमाण-पत्र देते हैं।