
दसवें आईफा अवार्ड समारोह के दौरान अमिताभ बच्चन विभिन्न कार्यक्रम और अवसरों पर मिले। वे आईफा के ब्रांड ऐम्बेसडर हैं, इसलिए इसके वार्षिक अवार्ड समारोह के समय उनकी सक्रियता बढ़ जाती है। वे अपने व्यस्त शेड्यूल के बीच समय निकालकर अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हैं। उनके जोश का जवाब नहीं। उनकी स्फूर्ति हैरान करती है। विदेशी भूमि में प्रशंसकों के बीच से लंबे डग भरते हुए जब वे चलते हैं, तो उनके आगे-पीछे एक उन्माद नाचता दिखता है। उस समय भारतीय होने के नाते गर्व का अहसास होता है। अपने सितारे पर फº होता है। अपना भी एक स्टार ऐसा है, जिसे दूसरे देशों में लोग पहचानते हैं और जिससे हाथ मिलाने के लिए उतावले रहते हैं।
इस समारोह में विदेशी पत्रकार और दर्शकों को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने संभाषण और बातचीत में हमेशा भारतीयता का ध्यान रखा। एक विदेशी पत्रकार ने पूछ लिया कि बॉलीवुड के भविष्य के बारे में वे क्या सोचते हैं? तो उनका जवाब था, मैं इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। किसी पत्रकार ने यह शब्द गढ़ा और प्रचलित होने के कारण यह शब्दकोष में भी आ गया है, लेकिन यह शब्द हमारी फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यह गलतफहमी है कि हिंदी में सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं। भारत में सबसे अधिक फिल्में तेलुगू में बनती हैं। भारतीय सिनेमा में इनके अलावा तमिल, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, उडि़या और भोजपुरी फिल्में भी शामिल हैं। भारतीय फिल्म और खास कर हिंदी फिल्मों के बारे में उन्होंने एक रूसी दर्शक की प्रतिक्रिया का उल्लेख बार-बार किया, एक रूसी ने मुझसे कहा था कि भारतीय फिल्म देखकर निकलते समय दर्शक के गाल पर आंसू का सूखा कतरा रहता है और होठों पर मुस्कान। भारतीय फिल्में एक साथ रुलाती-हंसाती हैं।
मकाऊ की एक पत्रकार ने पूछा कि समाज में सिनेमा का क्या रोल हो सकता है? अमिताभ बच्चन ने विस्तार से जवाब दिया, अलगाव और ईष्र्या से भरे समाज में सिनेमा सभी को जोड़ता है। हम सभी एक कहानी देखते हुए साथ-साथ रोते, हंसते, गाते और खुश होते हैं। सिनेमाघर के अंधेरे में पर्दे पर अपने चहेते सितारे को देखते समय हम परवाह नहीं करते कि अगल-बगल में बैठा हुआ व्यक्ति किसी जाति, संप्रदाय या धर्म का है। बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ भाईचारा का संदेश भी फिल्मों में होता है।
हर अवसर पर वे बुजुर्ग दार्शनिक और गुरु की मुद्रा में दिखे। सामान्य और घिसे-पिटे प्रश्नों पर भी उन्होंने उकताहट नहीं दिखाई। भारत में कोई नौसिखुआ पत्रकार सामान्य या बचकाना सवाल पूछता है, तो उनके होठों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान आ जाती है, लेकिन मकाऊ में मामूली और गैरमामूली सवालों को भी उन्होंने गंभीरता से सुना और अपने जवाब से प्रश्नकर्ता को संतुष्ट किया। उन्होंने अभिव्यक्ति पर किसी भी प्रकार के अंकुश या निर्देश को अनुचित माना। उन्होंने उदाहरण दिया, आप किसी चित्रकार को कैसे कह सकते हैं कि लो ये दो रंग और इनसे ही अपने चित्र बनाओ। हां, किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति में हमें स्थानीय और ग्लोबल संवेदना और संस्कृति का ध्यान रखना चाहिए। सरकार ने सेंसर बोर्ड का गठन किया है। वह फिल्मों में उचित-अनुचित का फैसला करता रहता है।
बिग बी ने फिल्मों की सार्वभौमिकता का खास उल्लेख किया। उन्होंने कहा, सिनेमा मनुष्य की संभावनाओं के बारे में बताता है। हम सभी मनुष्य हैं, इसलिए हम सभी एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हैं। भारतीय फिल्मों में विचार से अधिक भावनाओं को महत्व दिया जाता है। हमारे दर्शक भावुक और भावनात्मक फिल्में ज्यादा पसंद करते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, पहले जिन फिल्मों का मखौल उड़ाया जाता था, अब उन्हें स्वीकार किया जा रहा है। उन पर शोध और अध्ययन हो रहे हैं। दुनिया समझना चाहती है कि भारतीय फिल्मों में ऐसी क्या खास बात है, जो अभी तक दर्शकों को लुभा रही है। नए दर्शक बना रही है। हमारी फिल्मों में कुछ खास तो है! बिग बी ने भारतीय फिल्मों के नए निर्देशकों के कौशल को रेखांकित करते हुए कहा, हमारे नए टैलेंटेड डायरेक्टर आक्रामक तरीके से क्वालिटी बढ़ा रहे हैं। वे इंटरनेशनल स्टैंडर्ड से कई मायने में आगे हैं। वे दुनिया के दूसरे हिस्सों की फिल्मों से परिचित हैं। वे ग्लोबल सोच के निर्देशक हैं। मुझे खुशी है कि मैं उनमें से कुछ निर्देशकों के साथ काम कर रहा हूं। उन्होंने यह भी कहा, किसी और पुरस्कार या समारोह से अपनी तुलना करने की जरूरत नहीं है। पश्चिम पश्चिम है, तो पूरब पूरब है। हम अपनी परंपरा पर गर्व करें और उसी को विकसित और परिष्कृत करें। हमें अपने दर्शकों का खयाल रखें और उनके मनोरंजन के लिए अच्छी फिल्में बनाएं।
-अजय ब्रह्मात्मज