इक वो भी दिवाली थी..

इक वो भी दिवाली थी..

त्योहार खुशियों का संदेश लेकर आते हैं और छोड़ जाते हैं अपने पीछे कुछ खट्टी-मीठी यादें..। कुछ ऐसी ही यादों को तरंग से बांट रहे हैं छोटे पर्दे के ये कलाकार..

मंदिरा बेदी

कुछ वर्ष पहले की बात है। हमने बांदरा के बेहद खूबसूरत लोकेशन में एक बंगला खरीदा। वह मेरे लिए एक सपने के साकार होने जैसा था। हमने दीवाली के ही दिन गृहप्रवेश रखा। मैंने और राजदीप ने मिलकर बंगले के कोने-कोने में दीये जलाए। उस रात हमारा बंगला दुल्हन की तरह सजा हुआ था। मां लक्ष्मी की कृपा से वह बंगला मेरे लिए बहुत शुभ साबित हुआ। उसमें कदम रखने के बाद मेरा करियर दिवाली के दीपों की तरह जगमगा उठा। मैं आज भी उसी में रहती हूं।

रोनित राय

उस समय मैं यही कोई बारह या तेरह साल का रहा होऊंगा। रोहित और मेरे लिए दिवाली एक खुली आजादी की तरह होती थी। मेरे लिए दिवाली का बस एक ही अर्थ था कि खूब सारे पटाखे और मोहल्ले के लड़कों के साथ शैतानी जमकर करना..। दिवाली की उस रात दादागीरी दिखाने के लिए मैं सुतली बम हाथ में जलाकर फेंक रहा था। जब बम हवा में फटता, तो बहुत मजा आता था। इसी क्रम में एक बम में मैं आग लगाकर फेंक ही रहा था कि वह मेरे हाथ में ही फट गया। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। जब होश आया, तो पाया कि मेरे हाथ जल गए हैं। मेरी हालत देखकर रोहित भी सकपका गया था। फिर हमने कसम खाई कि आइंदा हम दिवाली पर पटाखों से दूर रहेंगे, लेकिन अगले साल फिर दिवाली आई। हमने पिछली सारी बातें भूलाकर नए जोश और उत्साह के साथ जुट गए आतिशबाजी करने में।

नेहा बाम्ब

सात साल पहले की बात है। काफी कोशिश और प्रतीक्षा के बाद मुझे करिअर की पहली फिल्म साइन करने का मौका मिला था। संयोग कहिए कि वह दिवाली का ही दिन था। मेरे लिए यह सौभाग्य की बात थी। मेरी इस खुशी में पूरा परिवार मेरे साथ था। फिल्म के साइनिंग अमाउंट के रूप में मुझे अच्छी रकम मिली थी। वह रकम मैंने लक्ष्मी पूजा और परिवार के लिए दिवाली के उपहार पर खर्चे। यह सब करके मुझे मानसिक रूप से बहुत संतुष्टि मिली। मेरे लिए दिवाली उसी दिन से यादगार हो गई।

स्मृति कालरा

(जी टीवी के धारावाहिक करोल बाग की सिम्मी) बचपन से लेकर आज तक दिवाली का त्योहार मेरे लिए खुशियों का पैगाम लेकर ही आता रहा है। अच्छी-अच्छी ड्रेसेज पहनकर परिवार के साथ दिवाली सेलिब्रेट करने का अलग ही मजा है। परिवार से अलग रहकर कोई भी त्योहार मनाने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती, लेकिन इस बार लगता है कि मुझे ऐसा अवसर नहीं मिलेगा। दरअसल, मेरे पिताजी आर्मी में हैं। इस समय वे चेन्नई में पोस्टेड हैं। इसके पहले हम सभी खास त्योहार पर उनके पास चले जाते थे, लेकिन इस बार करोल बाग जैसे डेली सीरियल की शूटिंग से मुझे छुट्टी नहीं मिल रही है। मैं सीरियल से अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकती, लिहाजा इस दिवाली पर मैं मां को अपने पास रोक लूंगी। वैसे सीरियल की टीम भी सामूहिक रूप से दिवाली सेलिब्रेट करने की योजना बना रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि परिवार से दूर रहकर हम किस तरह की दिवाली सेलिब्रेट करते हैं।

करण सिंह

बचपन की बात है। मैं मोहल्ले के बच्चों के साथ पटाखे फोड़ने के लिए पास के पार्क में गया था। सारे बच्चे पटाखे छुड़ा रहे थे। वहां काफी लोग इकठ्ठे थे। मैं भी अपने पटाखे फोड़ कर खुश हो रहा था। मैंने अपने पटाखों का थैला कंधे पर लटका रखा था। अचानक सामने से एक जलता हुआ रॉकेट मेरी तरफ आया। मैं पीछे हटा, लेकिन वह रॉकेट सीधा मेरे थैले से टकराया और थैले में आग लग गई। इसके पहले कि मैं थैला खुद से अलग करता, आग से बुरी तरह झुलस गया। उसके बाद से दिवाली पर मैंने पटाखे फोड़े। सच कहूं, तो उसके बाद मुझे पटाखे कभी पसंद ही नहीं आए। मैं लोगों से भी यही कहूंगा कि आप पटाखे छुड़ाकर प्रदूषण न फैलाएं। सही मायने में दिवाली खुशियां सेलिब्रेट करने का त्योहार है।

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