
चर्चित फिल्म संगीतकार प्रीतम चक्रवर्ती की इंडस्ट्री में धूम है। महज पांच साल में तमाम कामयाब फिल्मों का संगीत रचकर उन्होंने एक अलग पहचान बनाई है। वे इन दिनों दर्जन भर फिल्मों में म्यूजिक दे रहे हैं। इसके साथ ही वे जी टीवी के म्यूजिकल शो सारेगामापा : संगीत का विश्वयुद्ध में धूम घराने के मेंटर हैं। पिछले दिनों प्रीतम इसी शो में अपने घराने की प्रतिभागी याशिता यशपाल शर्मा के साथ दिल्ली में थे। इस दौरान उनसे बातचीत हुई।
प्रीतम से पहला सवाल हुआ कि एक म्यूजिक डायरेक्टर के लिए किसी टैलॅन्ट हंट शो का मेंटर बनना कितना चैलेंजिंग होता है? उन्होंने कहा, कोई खास चैलेंज नहीं होता। दोनों जगह संगीत ही अहम होता है, इसलिए बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं होती। हां, काम के नेचर में थोड़ा-बहुत फर्क जरूर आ जाता है। फिल्मों में म्यूजिक देने से पहले जहां स्क्रिप्ट का गहन अध्ययन करना पड़ता है और किरदारों को जेहन में रखना पड़ता है, वहीं म्यूजिकल शो के मेंटर बनने के बाद किसी कलाकार में संगीत की समझ, उसकी आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ उसकी तमाम खूबी और खामियों पर ध्यान देना पड़ता है। इसके अलावा, अन्य चीजें अमूमन सामान्य ही होती हैं।
प्रीतम के हिसाब से इस तरह के टैलॅन्ट हंट शो से किसी कलाकार का कितना भला होता है? बहुत, क्योंकि म्यूजिकल शो एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां एक कलाकार अपनी प्रतिभा को आसानी से एक्सपोज कर सकता है। वे आगे कहते हैं, स्वाभाविक रूप से गुरु के सान्निध्य में आने पर उसकी प्रतिभा और निखरती है। ऐसे में जहां एक ओर इस प्लेटफॉर्म से उसे व्यापक पहचान मिलती है, बहुत कुछ सीखने को मिलता है, वहीं भविष्य में उसे काम के लिए बहुत ज्यादा भटकना नहीं पड़ता। मेरे हिसाब से टैलॅन्टेड कलाकारों को ऐसे शो से काफी फायदा होता है।
लेकिन खिताब न जीतने पर कलाकार डिप्रेशन में भी तो आ जाता है? प्रीतम स्वीकारते हैं, एक हद तक आपकी बात सही है, लेकिन यह बात ज्यादातर ऐसे कलाकारों पर लागू होती है, जो ऐसे शो को ही अंतिम पड़ाव मान लेते हैं या फिर उन्हें अपनी प्रतिभा पर भरोसा नहीं होता, जबकि एक सच्चा कलाकार हार में भी जीत की तलाश करता है और हार से प्रेरणा लेकर हमेशा बेहतर करने की कोशिश करता है। हम जैसे मेंटर का काम केवल कलाकारों को संगीत की बारीकियां सिखाना ही नहीं होता, बल्कि उनके अंदर हार या कमजोरियों को स्वीकार करने की ताकत को डेवलॅप करने की कला का विकास करना भी होता है। हम इस शो में भी अपने घरानों के कलाकारों के साथ ऐसा ही करते हैं। हम कलाकारों को बताते हैं कि शो कोई भी हो, लेकिन विजेता कोई एक ही होगा। अंत तक टक्कर देने वाले का कद भी किसी विनर से कम नहीं होता।
प्रीतम फिल्म के लिए संगीत रचने से पहले कैसा और कितना अध्ययन करते हैं? वे कहते हैं, सबसे पहली बात यह कि कामयाबी का कोई शॉर्टकट और मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। मैं ईमानदारी से कड़ी मेहनत करता हूं। प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की बात सुनता हूं कि वे मुझसे क्या उम्मीद रखते हैं। उसके बाद स्क्रिप्ट का अध्ययन करता हूं। किरदारों में खुद झांककर देखता हूं कि पर्दे पर कैसा नजर आऊंगा! हर तरह से संतुष्ट होने के बाद ही संगीत तैयार करता हूं। इसके बावजूद कभी कामयाबी मिलती है, तो कभी नाकामी से भी दो-चार होना पड़ता है, लेकिन खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि धूम के बाद से मेरे खाते में ढेर सारी हिट फिल्में आई।
प्रीतम अपने म्यूजिक में सैक्सोफोन का बहुत इस्तेमाल करते हैं। इसकी वजह? वे बताते हैं, लोगों को लगता है कि मैं सैक्सोफोन का इस्तेमाल करता हूं, लेकिन असल में यह तुर्की का एक अत्यंत प्राचीन म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट दुदुक है, जिसकी आवाज सैक्सोफोन से मिलती है। अपने म्यूजिक में दुदुक का इस्तेमाल मैंने सबसे पहले धूम के लिए किया था। उसके बाद लगभग हर फिल्म में इसका इस्तेमाल करता हूं।
प्रीतम किस म्यूजिक डायरेक्टर से ज्यादा प्रभावित हैं? वे बताते हैं, पुराने समय के संगीतकारों में तो सभी अव्वल थे, लेकिन मैं आर.डी. बर्मन साहब का फैन रहा हूं। इस वक्त भी इंडस्ट्री में एकसे बढ़कर एक टैलॅन्टेड म्यूजिक डायरेक्टर हैं। सबकी अलग-अलग खासियत है। इसके बावजूद मैं ए.आर. रहमान को सबसे ऊपर मानता हूं। इसकी वजह उनकी बेजोड़ कल्पनाशीलता है। पिछले दिनों उन्हें गोल्डेन ग्लोब मिला, जो हमारे देश के लिए गर्व की बात है। उनके बाद शंकर-एहसान-लॉय, विशाल भारद्वाज, सलीम-सुलेमान, विशाल-शेखर और हिमेश रेशमिया का मैं नाम लूंगा। नया क्या आने वाला है? वे बातते हैं, बहुत जल्द बिल्लू बार्बर आएगी। खास बात यह है कि इसमें तीन आइटम नंबर हैं। इसके अलावा, लक, अजब प्रेम की गजब कहानी, हेलो डार्लिग, हाउसफुल, लाइफ पार्टनर, न्यूयॉर्क, दे दना दन, हुक या क्रुक आदि में भी म्यूजिक दे रहा हूं। वैसे, कुछ और अनाम फिल्में भी हैं।
-एस.नूपुर