
मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री में खुशी है कि मल्टीप्लेक्स और निर्माता-वितरकों के बीच लाभांश को लेकर चल रहा विवाद समाप्त हो गया। मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने आखिर निर्माता-वितरकों की मांग मानी। ऊपरी तौर पर निर्माता और वितरक फायदे में रहे, क्योंकि उन्होंने अपने लाभांश के प्रतिशत बढ़वा लिए। मल्टीप्लेक्स के मालिकों को यही संतुष्टि है कि उन्होंने निर्माता-वितरकों की मांग को शत-प्रतिशत नहीं माना। उन्होंने अपनी तरफ से उसे कम किया। इस विवाद और लड़ाई में एक-दो बार दर्शकों से जुड़े मामले जरूर उठे, लेकिन अंतिम सहमति के समय उन मामलों पर कुछ नहीं कहा गया। विवाद के समय मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने फिल्म की क्वालिटी पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि निर्माताओं को अच्छी फिल्मों के निर्माण पर जोर देना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक फिल्मों को देखने आएं। दूसरी तरफ निर्माताओं ने सवाल उठाया था कि मल्टीप्लेक्स मालिकों को टिकट रेट कम करना चाहिए। टिकटों की कीमत कम होगी, तो मल्टीप्लेक्स में ज्यादा दर्शक आएंगे। दोनों ही तरफ से उठाए सवाल वास्तव में दर्शकों की संख्या और फिर बिजनेस बढ़ाने के मुतालिक थे, लेकिन वे दर्शकों के हित में थे। अच्छी क्वालिटी की फिल्में मिलें और टिकटों की कीमतें कम हो जाएं, तो दर्शकों को फायदा होगा। फिलहाल इस संदर्भ में दोनों पक्षों में किसी ने कोई संकेत नहीं दिया है। हां, अच्छी क्वालिटी की फिल्मों के बारे में आमिर खान और शाहरुख खान ने कहा था कि कोई भी निर्माता-निर्देशक जानबूझ कर बुरी फिल्में नहीं बनाता। कोई भी यह नहीं तय करता कि चलो एक बुरी फिल्म बनाते हैं। टिकटों की कीमत कम करने के मामले में मल्टीप्लेक्स मालिकों का कहना था कि उनके लिए सभी सुविधाओं के साथ फिल्में दिखाना महंगा व्यापार है। अगर वे टिकटों की कीमत कम करेंगे, तो उन्हें नुकसान होगा।
छोटे शहर और कस्बों के थिएटरों में टिकट की कीमत हर फिल्म के साथ नहीं बदलती। मल्टीप्लेक्स में फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा को देखकर मल्टीप्लेक्स मालिक कीमत बढ़ा देते हैं। गजनी और रब ने बना दी जोड़ी की टिकटें ऊंची कीमतों पर बेची गई। उसी तरह चांदनी चौक टू चाइना की भी कीमत बढ़ाई गई थी, लेकिन फिल्म के प्रति दर्शकों के उदासीन रवैए को देखते हुए फिर से कीमतें घटा दी गई। मल्टीप्लेक्स मालिकों ने दर्शकों के प्रोफाइल को अच्छी तरह समझ लिया है। वे महानगरों में कार्यरत युवा प्रोफेशनल के वीकएंड मनोरंजन की भूख को समझ चुके हैं। अगर आप मल्टीप्लेक्स में शनिवार-रविवार की भीड़ का मुआयना करें, तो समझ जाएंगे कि युवा दर्शकों की संख्या भरपूर रहती है। ऊंची कमाई और महानगरों की अकेली जिंदगी में मॉल और मल्टीप्लेक्स उनकी वीकएंड गतिविधि का अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। वे अब एक दिन पहले के प्रिव्यू शो के लिए भी मोटी रकम दे रहे हैं। गजनी ने अपने प्रिव्यू शो से ही आरंभिक कमाई कर ली थी।
65 दिनों के गतिरोध और मनोरंजन का कृत्रिम अकाल लाने के बाद भले ही निर्माता-वितरक और मल्टीप्लेक्स परस्पर सहमति से फिल्मों की रिलीज के लिए तैयार हो गए हों, लेकिन सच्चाई यह है कि इस विवाद और गतिरोध में दर्शकों का खयाल नहीं रखा गया। फिल्म इंडस्ट्री मल्टीप्लेक्स संस्कृति के प्रभाव में देसी दर्शकों से पहले ही बेपरवाह हो चुकी है। अब वे महानगरों के अमीर दर्शकों के साथ भी मनमाना व्यवहार कर रहे हैं। दर्शक अभी तक नुकसान में हैं। निर्माताओं को जरूर फायदा हुआ। उनके लाभांश के प्रतिशत बढ़ गए, लेकिन दर्शकों की जेब तो वैसे ही खाली होती रहेगी। क्या अब दर्शकों को अपनी मांग के लिए हड़ताल पर जाना पड़ेगा? मुमकिन है दर्शकों के बीच से ऐसा अभियान शुरू हो, वे मल्टीप्लेक्स के शो का बहिष्कार आरंभ करें। तभी मल्टीप्लेक्स के मालिक और निर्माता-वितरक उनकी सुधि लेंगे।
-अजय ब्रह्मात्मज