कभी अलविदा न कहना

कभी अलविदा न कहना

मुख्य कलाकार : अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, अभिषेक बच्चन, किरण खेर, प्रीति जिंटा और रानी मुखर्जी।

निर्देशक : करण जौहर

तकनीकी टीम : निर्माता- हीरू जौहर, पटकथा- शिवानी बलिजा, संवाद- निरंजन अलंकार, संगीत- शंकर-अहसान-लॉय, गीत- जावेद अख्तर।

प्रतीक्षित और चर्चित फिल्म कभी अलविदा ना कहना अपेक्षित संतोष नहीं देती। करण जौहर की इस फिल्म को साल की बड़ी फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया है। फिल्म निश्चित रूप से बड़ी है, क्योंकि इसे करण जौहर ने निर्देशित किया है। वह स्वयं किसी भी लोकप्रिय स्टार के समान पॉपुलर हैं। उन्होंने देश के सभी बड़े स्टारों अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, अभिषेक बच्चन, प्रीति जिंटा और रानी मुखर्जी को एकत्रित किया। ये सारे स्टार उनके परिवार के सदस्य की तरह हैं। उन्होंने इन सभी के साथ एक पारिवारिक फिल्म बना डाली है। ऋषि तलवार की शादी माया से होने जा रही है। माया इस शादी से अधिक खुश नहीं दिख रही है। शादी की रस्मों के समय वह लॉन में बेच पर अकेली बैठी है। वहां देव सरन आता है। वह कुछ मीठी-मीठी बातें करने के साथ ही उसके मन में यह बिठा जाता है कि वह जिससे शादी कर रही है, उससे मुहब्बत नहीं करती। इसके साथ ही वह उस पर आसक्त होता दिखाई पड़ता है। उसकी बातों से बेसुध हुए देव का एक्सीडेंट हो जाता है और उसके फुटबाल खिलाड़ी बनने के सपने की मौत हो जाती है। वह अपनी बीवी रिया से खिंचा-खिंचा रहता है। बीवी नौकरीपेशा और कामयाब है। मॉडर्न करण जौहर भी उसी घिसी-पिटी धारणा के साथ किरदार गढ़ते हैं कि कामकाजी औरतें पति और परिवार को समय नहीं दे पातीं। अच्छी बात है कि रिया अपनी नौकरी और कामयाबी को लेकर किसी अपराध भाव से ग्रस्त नहीं है। बहरहाल, देव और माया की फिर से मुलाकातें होती हैं। दोनों अपने एकाकीपन को बांटते-बांटते एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। दोनों को एहसास होता है कि उन्होंने गलत व्यक्तियों से शादियां कर ली हैं। उनका गुपचुप प्रेम उजागर हो जाता है। फिर मेलोड्रामा आरंभ होता है। आखिरकार दोनों मिल जाते हैं।

करण जौहर ने प्रेमहीन विवाह को फिल्म का विषय बनाया है। उनकी राय है कि अगर विवाह में मुहब्बत न हो तो उसका टूट जाना स्वाभाविक और जरूरी है। अपनी धारणा के लिए उन्होंने दो दंपतियों के वैवाहिक जीवन से जो प्रसंग लिए हैं,वे दिल को नहीं छूते और विश्वसनीय भी नहीं लगते। फिल्म के प्रसंगों और दृश्यों में कृत्रिमता है। यहां तक कि विवाह टूटने के कारण बहुत छोटे और ऊपरी हैं। गौरतललब है कि पूरी फिल्म की पृष्ठभूमि न्यूयार्क है। वहां रिश्तों में ऐसी भावनाओं की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसा तनाव भी नहीं रहता। इस फिल्म में सब कुछ चमकदार, भव्य, विशाल और बड़ा है। करण जौहर की फिल्मों में कुछ भी साधारण और सामान्य नहीं रहता। इस फिल्म की सेटिंग, कॉस्टयूम और लोकेशन में नियोजित भव्यता रखी गयी है। अगर आप वायवीय,पलायनवादी और पारंपरिक मेलोड्रामा पसंद करते हैं तो कभी अलविदा ना कहना बहुत पसंद आएगी। हां, यह उन दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आएगी,जो फिल्मों को सिर्फ तिलिस्म नहीं मानते। करण जौहर अपनी फिल्मों में मॉडर्न तिलिस्म और फंतासी गढ़ते हैं। इस तिलिस्म में कोई लॉजिक नहीं होता। फिल्म का निर्देशक अपने किरदारों को लोकतांत्रिक तरीके से विकसित नहीं होने देता। किसी तानाशाह की तरह वह अपनी मर्जी से किरदारों को विकसित और चित्रित करता है।

कलाकारों में अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान अपने किरदारों को बखूबी निभा जाते हैं। अभिषेक बच्चन कुछ दृश्यों में संघर्ष करते दिखाई पड़ते हैं। रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा अपने रोल के समकक्ष नहीं पहुंच पातीं। किरण खेर सामान्य हैं। फिल्म की पटकथा ढीली है और कई दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे हो गए हैं। संवादों में अंग्रेजी का साफ प्रभाव है। उदाहरण के लिए रानी मुखर्जी बोलती हैं कि पति-पत्नी बिस्तर ही नहीं बांटते,जीवन भी बांटते हैं। यहां अंग्रेजी के शेयर शब्द का अनुवाद बांटना कर दिया गया है। बिस्तर बांटना मुहावरा हिंदी का नहीं है और उसका अर्थ बिस्तर में साथ होना तो कतई नहीं होता।

फिल्म के संगीत में करण जौहर की पिछली फिल्मों का असर है। दो गानों में तो केवल शब्द अलग हैं, बाकी मूड बौर फिल्मांकन तक एक जैसा है। करण जौहर कभी अलविदा ना कहना में अपनी पिछली दोनों फिल्मों से पीछे गए हैं।

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