आहिस्ता आहिस्ता

आहिस्ता आहिस्ता

मुख्य कलाकार : अभय देओल, सोहा अली खान, शायन मुंशी, मुराद अली, कामिनी खन्ना आदि।

निर्देशक : शिवम नायर

तकनीकी टीम : निर्माता- अंजुम रिजवी, लेखक- इम्तियाज अली, गीत- इरशाद कामिल, संगीत- हिमेश रेशमिया

दो युवा दिलों के बीच आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ता प्रेम का एहसास ़ ़ ़ आज की भागती दुनिया में भी यह एहसास खोया नहीं है। बस, हमारे कहानीकार और फिल्मकार ऐसी कोमल भावनाओं को बीते जमाने की बात समझकर छोड़ रहे हैं। इन दिनों सारा जोर विवाहेतर संबंधों के तनाव पर है। प्रेम, विवाह और सुखद जीवन की सुंदर अभिव्यक्तियां फिल्मों से गायब हो रही हैं।

पहली बार निर्देशन में आए शिवम नायर ने प्रेम के इस सुखद और कोमल एहसास को दिल्ली-6 की पृष्ठभूमि में चित्रित करने की सफल कोशिश की है। अंकुश चांदनी चौक के आसपास ही कहीं मैरिज रजिस्ट्रार के दफ्तर के बाहर मंडराता रहता है। शादी करने आए युवक-युवतियों के लिए वह गवाह बन जाता है। इस गवाही के एवज में उसे दो सौ रूपए मिल जाते हैं। अंकुश की मुलाकात एक दिन मेघा से हो जाती है। मेघा नैनीताल से भागकर आई है। उसका प्रेमी समय पर वहां नहीं पहुंच पाता। सुबह से शाम हो जाती है। अब मेघा जाए तो जाए कहां? अंकुश को उससे सहानुभूति होती है। वह उसके ठहरने का इंतजाम कर देता है। मेघा का इंतजार बढ़ता जाता है। उसका प्रेमी नहीं आ पाता और वह अपने घर नहीं लौट सकती। वह एक वृद्घाश्रम में नौकरी कर लेती है। मेघा और अंकुश का मिलना जारी है। दोनों एक-दूसरे के करीब आते हैं और फिर उनके बीच प्रेम पनपता है। यह प्रेम परवान चढ़े और उनकी शादी हो इसके पहले मेघा का प्रेमी धीरज आ जाता है। अब मेघा क्या करे? वह अंकुश और धीरज में से किसे चुने अपना जीवन साथी? शिवम नायर ने बगैर किसी ताम-झाम और फूहड़ भव्यता के इस फिल्म का परिवेश गढ़ा है। लंबे समय के बाद वह मध्यवर्गीय परिवेश की कहानी लेकर आते हैं। अंकुश, मेघा और धीरज हमें अपने पड़ोसी लगते हैं। शिवम नायर ने संबंधों का सुंदर चित्रण किया है। अंकुश और खाला की नोंक-झोंक और प्रेम देश की गंगा-जमुनी संस्कृति का बयान करती है। दिल्ली की यह वैसी दुनिया है, जो आज भी पुरानी दिल्ली की गलियों में जिंदा है। दिल्ली के उस जीवन की छोटी झलक आहिस्ता आहिस्ता में मिलती है। शिवम नायर के दृश्य संयोजन में ताजगी है। वह दृश्यों को वास्तविकता के करीब रखते हैं। दर्शकों को चौंकाने, चौंधियाने या बेवजह उत्तेजित करने की कोई कोशिश नहीं है इस फिल्म में। शांत नदी की तरह बहती आहिस्ता आहिस्ता की प्रेम कहानी दिल को छूती है।

मल्टीस्टारर फिल्मों के इस दौर में अभय देओल और सोहा अली खान की सोलो फिल्म है आहिस्ता आहिस्ता। दोनों अपेक्षित रूप से नए स्टार हैं, लेकिन शिवम नायर के सधे निर्देशन में दोनों ने सहज अभिनय किया है। अभय देओल और सोहा अली में कहानी के अनुरूप झिझक, भावना और मुस्कराहट दिखती है।

सीमित बजट में बनी इस फिल्म में कुछ कमियां खलती हैं, पर शिवम नायर ने अपनी सूझ-बूझ से उन कमियों को उजागर होने से रोका है। आहिस्ता आहिस्ता की सहजता आकर्षित करती है।

नुक्कड़ टाइप के किरदार आम जीवन का संस्पर्श देते हैं। फिल्म का संगीत कहानी के मेल में नहीं है। निर्माता ने लोकप्रियता के लोभ में हिमेश रेशमिया को संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी दे दी है। हिमेश फिल्म की थीम के साथ न्याय नहीं कर पाते।

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