
मुख्य कलाकार : संजय दत्त, विद्या बालन, अरशद वारसी, जिम्मी शेरगिल, दीया मिर्जा, बोमन ईरानी आदि।
निर्देशक : राजकुमार हिरानी
तकनीकी टीम : निर्माता - विधु विनोद चोपड़ा, लेखक - राजकुमार हिरानी, अभिजीत जोशी, गीत- स्वानंद किरकिरे, संगीत- शांतनु मोइत्रा
नए किस्म की रोमांटिक कॉमेडी है लगे रहो मुन्ना भाई। मुन्ना और सर्किट की दादागिरी का धंधा ठीक चल रहा है। मुन्ना रेडियो जॉकी जाह्नवी की आवाज का दीवाना है। रेडियो पर गुड मार्नि़ ़ ़ग, मुंबई सुनते ही उसके होंठों पर मुस्कराहट तैर जाती है। मुन्ना की एक ही इच्छा है कि वह जाह्नवी से मिले और अपनी दीवानगी जाहिर कर दे। इस प्रेम कहानी में संयोग से बापू यानी महात्मा गांधी आ जाते हैं और फिर पूरी फिल्म का माहौल बदल जाता है।
लगे रहो मुन्ना भाई वास्तव में प्रेम कहानी ही है। मुन्ना और जाह्नवी की इस प्रेम कहानी में मुन्ना की दादागिरी और गांधीगिरी दोनों ही है। फिल्म शुरू होते ही मुन्ना और जाह्नवी की मुलाकात का संयोग बनता है। अगले दिन 2 अक्तूबर है और उस दिन जाह्नवी के प्रोग्राम में कांटेस्ट जीतने पर स्टूडियो जाकर उससे मिलने का मौका मिल सकता है। सर्किट कांटेस्ट जीतने की प्लानिंग करता है और महात्मा गांधी के जानकारों को बंधक बना कर ले आता है। मुन्ना कांटेस्ट जीत जाता है और जाह्नवी से हुई मुलाकात के समय झूठ बोल देता है कि वह हिस्ट्री का प्रोफेसर है। अब गांधी के बारे में जानना और बताना उसकी मजबूरी हो जाती है। वह गांधी को पढ़ता है और फिर गांधी उसकी मदद के लिए सामने आ जाते हैं। पूरी फिल्म रोचक और मनोरंजक प्रसंगो के साथ गांधी के दर्शन से भी परिचित कराती चलती है।
निर्देशक राजकुमार हिरानी और उनकी लेखकीय टीम ने एक विचार को फिल्म में बदला है, इसलिए बगैर किसी ठोस कहानी की इस फिल्म में मजेदार घटनाओं का क्रम है। पर्दे पर गांधी की उपस्थिति की सुंदर फंतासी गढ़ी है हिरानी ने। इस फंतासी की वह वैज्ञानिक व्याख्या भी कर देते हैं, ताकि उनका चित्रण और वर्णन कल्पना की उड़ान मात्र न रह जाए। फिल्म निर्माण में आए तकनीकी विकास का राजकुमार हिरानी ने सुंदर उपयोग किया है।
आधुनिक फिल्म और सिनेमा की नयी भाषा देखनी-समझनी हो तो लगे रहो मुन्ना भाई देखना जरूरी है। पटकथा की कसावट और संवादों की सुंदरता उल्लेखनीय है। संजय दत्त ने मुन्ना के किरदार को पूरी संजीदगी से उसके मिजाज के अनुसार निभाया है। इस उम्र में भी उनकी चेहरे की मासूमियत और हर प्रकार के दृश्यों के मुताबिक खुद को ढालने की गति प्रभावित करती है। सर्किट के रोल में अरशद वारसी ने उनका बराबर साथ दिया है। हां, कई बार लगता है कि सर्किट को कुछ और संवाद या कुछ और दृश्य मिलने चाहिए थे। विद्या बालन पिछली फिल्म से बनी इमेज को सहजता से तोड़ देती हैं। रेडियो जॉकी की चुलबुल और संवदेनशील भूमिका में वह जंची हैं। बोमन ईरानी का किरदार एक आयामी था, लेकिन वह अभिनय क्षमता का उपयोग कर दर्शकों को ऊबने नहीं देते। दीया मिर्जा और जिम्मी शेरगिल चंद दृश्यों में भी अपनी संलग्नता जाहिर करते हैं। बुजुर्गो की भूमिकाओं में आए कलाकार रोचकता बनाए रखते हैं।
संवाद और पटकथा के समान फिल्म का गीत-संगीत भी उल्लेखनीय है। फिल्म के लिए उपयुक्त गीत-संगीत रच पाना अधिक मुश्किल काम है। दो पॉपुलर आइटम नंबर तैयार करना उद्देश्य न हो तो अधिक मेहनत करनी पड़ती है। स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा की जोड़ी फिर से असरदार संगीत दे गयी है। कुछ गीतों में ध्वनियों और स्वरों का प्रयोग नया और कथ्य के अनुकूल है। बंदे में था दम ़ ़ ़ गीत भावपूर्ण है। गांधी की छवि को शब्दों में गढ़ दिया है गीतकारों ने।
लगे रहो मुन्ना भाई हर लिहाज से दर्शनीय फिल्म है। यह गुदगुदाती, हंसाती, रुलाती और फिर शुद्घकर जाती है दर्शकों को। जी हां, फिल्म देखकर आप खुद को हल्का और ओजपूर्ण महसूस कर सकते हैं।