
मुख्य कलाकार : अभय देओल, परेश रावल, नीतू चंद्रा, अर्चना पूरन सिंह आदि
निर्देशक : दिबाकर बनर्जी
तकनीकी टीम : निर्माता - रोनी स्क्रूवाला, गीत-दिबाकर बनर्जी, मांगे राम आदि, कथा-पटकथा-उर्मी जुवेकर, दिबाकर बनर्जी
सब से पहले इस फिल्म के संगीत का उल्लेख जरूरी है। स्नेहा खानवलकर ने फिल्म की कहानी और निर्देशक की चाहत के हिसाब से संगीत रचा है। इधर की फिल्मों में संगीत पैकेज की तरह प्रस्तुत किया जाता है। फिल्म निर्माण से जुड़े लोगों की कोशिश रहती है संगीत अलग से पापुलर हो जाए। इस कोशिश में कई बार संगीत का संबंध फिल्म से टूट जाता है। स्नेहा खानवलकर पर ऐसा कोई दबाव नहीं था। उन्होंने फिल्म में लोकसंगीत और लोक स्वर का बढि़या उपयोग किया है। मांझेराम और अनाम बच्चों की आवाज में गाए गीत फिल्म का हिस्सा बन गए हैं। बधाई स्नेहा और बधाई दिबाकर बनर्जी।
दिबाकर बनर्जी की पिछली फिल्म खोसला का घोसला की तरह ओए लक्की ।़ लक्की ओए।़ भी दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बनी है। पिछली बार मध्यवर्गीय विसंगतियों और त्रासदी के बीच हास्य था। इस बार निम्न मध्यवर्गीय विसंगतियां हैं। इस परविार का एक होशियार बच्चा लकी (अभय देओल) दुनिया की बेहतरीन चीजें और सुविधाएं देखकर लालयित होता है और उन्हें हासिल करने का आसान तरीका अपनाता है। वह चोर बन जाता है। चोरी में उसकी चतुराई देख कर हंसी आती है। फिल्म के नायक लकी को रत्ती भर भी अफसोस या अपराध बोध नहीं है कि वह चोर क्यों बना? समाज के निचले तबके की विषम परिस्थितियां ऐसे भटकाव को सहज बना देती हैं। चोर की प्रेमिका सोनल (नीतू चंद्रा) भले ही उसके हाथ से पैसे न ले, लेकिन उसे चोर की प्रेमिका होने में शर्म महसूस नहीं होती। संभव है, उसके पास तर्क हो कि बड़ी बहन की तरह देह का धंधा करने से तो यह बेहतर स्थिति है। अगर आप संवेदनशील हैं तो निम्नमध्यवर्गीय परिवार के विषाद से दुखी हो सकते हैं। अन्यथा यह फिल्म हंसने को भरपूर प्रसंग देती है। आप इसे एक कामेडी फिल्म की तरह भी देख सकते हैं।
अभय देओल गैरपारंपरिक फिल्में अवश्य चुनते हैं, लेकिन अभिनेता के तौर पर वे अभी तक उच्चवर्गीय संस्कारों और व्यवहारों से जकड़े हुए हैं। वह मानसिक तौर पर तो लकी को जी लेते हैं, लेकिन उनका बाडी लैंग्वेज कई बार धोखा देता है। हालांकि अभय की तारीफ करनी होगी कि वह कोशिश करते हैं। नीतू चंद्रा सोनल के किरदार को परिवेश की इसी पूंजी की वजह से सहजता से निभा ले जाती हैं। फिल्म परेश रावल की तिहरी भूमिका के लिए भी याद रखी जाएगी। दिबाकर बनर्जी नई पीढ़ी के सशक्त निर्देशक के तौर पर उभर रहे हैं। उम्मीद रहेगी कि वह हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय शैली के चपेट में नहीं आएंगे और अपनी विशिष्टता बनाए रखेंगे।
-अजय ब्रह्मात्मज