मेरे दो बच्चे हों

मेरे दो बच्चे हों

कंगना राणावत की मासूमियत और चंचल अदाओं से पिछले दिनों छोटे पर्दे के दर्शक परिचित हुए। सलमान खान के कार्यक्रम 10 का दम में वे अतिथि बनकर आई थीं। उन्होंने कार्यक्रम में अपने व्यक्तित्व के अनजाने पहलुओं से दर्शक को रूबरू कराया। सिर पर घूंघट रखकर भारतीय परंपरा के प्रति उन्होंने अपना लगाव दिखाया, तो फिल्मी ठुमके भी लगाए। अपनी शादी से जुड़ी योजना बताई, तो सलमान खान को भी जल्द शादी करने की नसीहत दे डाली। दर्द भरी भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय कंगना के ऐसे हल्के-फुल्के अंदाज को देखकर दर्शक चकित थे। पिछले दिनों हुई मुलाकात में उन्होंने अपने व्यक्तित्व के ऐसे ही कुछ और अनछुए पहलुओं से हमको परिचित कराया। प्रस्तुत हैं उसके अंश..

खुद को देखना पसंद नहीं

मुझे खुद को स्क्रिन पर देखना पसंद नहीं है। मुझे लगता है कि स्क्रिन पर मैं अच्छी नहीं लगती। रिअॅल में मैं ज्यादा अच्छी दिखती हूं। कैमरे से मुझे प्यार है। कैमरे के सामने मैं कम्फर्टेबल रहती हूं, लेकिन अपनी परफॉर्मेस मॉनिटर पर देखना मुझे पसंद नहीं। मैं खुद को बार-बार स्क्रिन पर नहीं देख सकती, क्योंकि जब भी खुद को स्क्रिन पर देखती हूं, मुझे मेरे लुक की चिंता सताने लगती है। जो लोग मुझे जानते हैं वे भी कहते हैं कि मैं रिअॅल लाइफ में रील लाइफ से ज्यादा खूबसूरत दिखती हूं। इसलिए हर दिन खुद को शीशे में देखती हूं और महसूस करती हूं कि जो कंगना स्क्रीन पर दिखती है, वह शीशे में दिख रही कंगना नहीं हो सकती।

फिल्म-निर्देशन करूंगी

भविष्य में फिल्म डायरेक्टर बनना चाहती हूं। फिल्म डायरेक्ट करना मेरा पुराना सपना है। जल्द ही इस दिशा में प्रयास भी शुरू कर दूंगी, लेकिन पहले मैं विदेश जाकर फिल्म मेकिंग की ट्रेनिंग लूंगी। उसके बाद अपने मित्र और निर्देशक अनुराग बसु की सहायक बनूंगी, फिर अपनी फिल्म के डायरेक्शन की प्लानिंग शुरू कर दूंगी।

गलतियों से नहीं सीखती

मैं हमेशा अपने मन की करती हूं। अपनी गलतियों से नहीं सीखती हूं। खुद को परेशानियों में डालने की मेरी आदत है। अपने अनुभव के कारण ही मैं आज एक स्ट्रॉन्ग पर्सनैल्टी के रूप में उभर पाई हूं। उन सभी कड़वे अनुभवों के सामने डटकर खड़ी हो सकी, इस बात का मुझे गर्व है। अपनी रेस्पेक्ट करने लगी हूं। आज बाईस साल की उम्र में मैं कह सकती हूं कि किसी भी तरह की परेशानियां झेलने की मुझमें हिम्मत है। अब मैं लोगों को सही-सही पहचान सकती हूं। उनके अंदर झांक भी सकती हूं।

सबसे अलग हूं

मुझे हमेशा ही भीड़ में अलग दिखने की तमन्ना रही। मैं सबसे अलग हूं। यहां तक कि बचपन में भी मैं ऐसी फ्रॉक नहीं पहनती थी, जिसे मैंने अपनी दोस्त को पहने हुए पहले देख लिया हो। हमेशा ही अलग दिखने की कोशिश करती हूं और अपनी इस इच्छा के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहती हूं। फिल्मों में भी मैंने कभी टिपिकल भूमिकाएं नहीं निभाई हैं, क्योंकि मैं टिपिकल हीरोइन नहीं बनना चाहती।

मेरी भूख मिटती है

मैं ऐसी किताबें पढ़ना पसंद करती हूं, जिसे पढ़कर विचारों की अपनी भूख मिटा सकूं। उन किताबों को पढ़कर मैं अपने अंदर झांक सकती हूं और खुद में कुछ पॉजिटिव चेंज लाने की दिशा में प्रयास कर सकती हूं। मुझे रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द की किताबों ने बेहद प्रभावित किया है।

तकलीफ होती है

मैंने हिंदी मीडियम से पढ़ाई की है, इसीलिए मैं अंग्र्रेजी में लिखकर खुद को अच्छी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती। जब भी मैं अंगे्रजी में लिखी अपनी डायरी पर नजर दौड़ाती हूं, उसमें इमोशन की कमी झलकती है। हिमाचल से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई के सफर में मेरी भाषा में इतनी मिलावट हो गई है कि मैं यह भी भूल गई हूं कि किस तरह लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जाती है?

सपने पूरे नहीं हुए हैं

मेरे कई ऐसे सपने हैं, जिन्हें पूरा करना अभी बाकी है। दो-तीन क्लासिक फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाने का मेरा सपना है। सिनेमा पीस ऑफ आर्ट है। आप नहीं भी रहेंगे, तब भी अपनी फिल्मों के कारण आप याद किए जाएंगे। मैं सिनेमा को इस नजरिए से देखती हूं। साथ में चाहती हूं कि तीस की उम्र में मेरी शादी हो जाए और मेरे दो बच्चे हों। मैं, बच्चे और पति के साथ खुशहाल जीवन बिताऊं।

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