फिल्म मेकिंग आसान है: एकता कपूर

फिल्म मेकिंग आसान है: एकता कपूर

ऐसा लगता है कि छोटे पर्दे की महारानी यानी एकता कपूर का क अक्षर से मोहभंग हो चुका है। इसका प्रमाण हैं, उनके बैनर तले निर्मित दो नए धारावाहिक बेताब दिल की तमन्ना है और प्यार का बंधन, जिनका प्रसारण पिछले दिनों सोनी पर शुरू हुआ है। इन धारावाहिकों की लॉन्चिंग के समय हुई बातचीत के दौरान एकता से उनके नए धारावाहिक और छोटे पर्दे के वर्तमान माहौल पर हमने किए तीन सवाल..

आखिरकार क अक्षर से आपका मोहभंग हो ही गया। बंदिनी, बैरी पिया के बाद अब बेताब दिल की तमन्ना है और प्यार का बंधन से ऐसा ही लगता है?

सभी जानते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। हम भी इसका पालन कर रहे हैं। दर्शकों की बदलती पसंद का हम पूरा ध्यान रख रहे हैं। अपने बैनर तले बन रहे धारावाहिकों के बदले रंग-ढंग से दर्शकों को भी इस बात का एहसास हो गया होगा। जहां तक क अक्षर की बात है, तो यह सच है कि अब हमारे बैनर तले बनने वाले धारावाहिकों के नाम दूसरे अक्षरों से रखे जाने लगे हैं। इससे अधिक इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती। इतना कह सकती हूं कि दर्शक हमारे धारावाहिकों को उतना ही पसंद करेंगे, जितना पहले करते थे।

बेताब दिल की तमन्ना है को पहला एंटी हीरोइन धारावाहिक कहा जा रहा है। इसके बारे में विस्तार से बताएंगी?

इससे पहले दर्शक कई बार छोटे पर्दे पर एंटी हीरो वाले धारावाहिक देख चुके हैं। कहीं तो होगा में सूजल को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। बेताब दिल की तमन्ना है में पहली बार दर्शक एंटी हीरोइन को देख रहे हैं। इसकी शमोली न्यू एज की लड़की है। वह ऐसा नहीं सोचती कि क्या करना है? क्या नहीं करना है? क्या गलत है? क्या सही है? उसका मकसद सिर्फ अपनी मंजिल तक पहुंचना है। बेसिकली, बेताब दिल की तमन्ना है दो विचारधाराओं के संघर्ष की कहानी है। इसे दर्शक आज के जमाने की दीवार कह सकते हैं। इसमें स्टोरी से ज्यादा महत्व विचारधारा को दिया गया है। हमने इसमें दर्शकों के लिए कुछ नया पेश करने की कोशिश की है। उम्मीद है, हमारी यह कोशिश दर्शकों को पसंद आ रही होगी।

धारावाहिक के विषय में विविधता बनाए रखना कितना मुश्किल होता है?

बहुत मुश्किल होता है। कुछ दिन पहले तक सभी कह रहे थे कि हमारे धारावाहिक मिलते-जुलते लगते हैं। हमने इस बात पर गौर किया और अब हमारी कोशिश है कि हर धारावाहिक एक-दूसरे से अलग हो। हर धारावाहिक के लिए अलग-अलग कॉन्सेप्ट लाना काफी मुश्किल होता है। इसके मुकाबले फिल्म मेकिंग आसान होती है। फिल्म तो तीन घंटे की ही होती है, जबकि धारावाहिक लंबे अर्से तक चलते हैं।

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