आसान नहीं है जिंदगी

आसान नहीं है जिंदगी

नवजोत सिंह सिद्धू कौन हैं? इस सवाल के उत्तर कई होंगे- पूर्व क्रिकेटर, कमेंटेटर, राजनेता और लाफ्टर चैलेंज के जज, लेकिन उन्हें सिर्फ इन खासियतों से जाना नहीं जा सकता। खुद नवजोत मानते हैं, लोग मुझे जिस रूप में देखते हैं, मैं उन्हें वैसे ही दिखता हूं। सही मायने में नवजोत, जिन्हें हम जानते हैं, वे उनसे काफी अलग हैं। बातचीत नवजोत सिंह सिद्धू से..

अध्यात्म की ओर झुकाव कैसे हुआ?

बचपन से ही मुझे दुनिया की हर सुख-सुविधा मिली, लेकिन अंदर कुछ तड़प भी थी। इसी दौरान मैंने गुरु ग्रंथ साहिब को पढ़ना शुरू किया, लेकिन गुरमुखी में होने से ज्यादा समझ में नहीं आता था। फिर उसके अनुवाद मंगवाए। उन्हीं दिनों स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तक द कंप्लीट व‌र्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद पढ़नी शुरू की। वही मेरे जीवन का टर्निग प्वॉइंट बन गई। पहली बार लगा कि बाहरी दुनिया के भोगों के अलावा असली चीज कुछ और है। शायद इसी के लिए भरा पूरा साम्राज्य होते हुए भी दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने पूरा जीवन घोड़े की काठी पर बिता दिया। पूरा परिवार राष्ट्र और कौम के लिए न्योछावर कर दिया। स्वामी विवेकानंद ने भी कुछ अलग तरीके से कुछ ऐसा ही किया। इन दोनों महापुरुषों की शिक्षाओं ने मेरे अंतर को जगाया। तब से ये दोनों मेरे रोल मॉडल हो गए। स्वामी विवेकानंद की एक पंक्ति, मैं उस ईश्वर का सेवक हूं, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं मेरे जीवन का मूल-मंत्र है। चाहे क्रिकेट के माध्यम से या राजनीति या अन्य माध्यम से मैं जो भी सेवा करता हूं, इसी को ध्यान में रखता हूं।

राजनीति, धर्म, अध्यात्म के बीच कैसे तालमेल बिठाते हैं?

छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने कहा था राज बिना न धर्म चले पर धर्म बिना सब दले मले। यानी धर्म को राज के संरक्षण की जरूरत तो होती है, लेकिन धर्म के बिना क्या राज, क्या काज, सब कुछ दूषित व मलिन हो जाता है। भगवान राम अगर ऋषि मुनियों की सहायता न करते, तो क्या वे अपना स्वाभाविक और धार्मिक कर्म कर पाते? इसलिए धर्म और अध्यात्म के जरिए राजनीति ही असल राजनीति है और राजनीतिज्ञ को इनकी रक्षा करते हुए इन्हीं के अनुसार चलना चाहिए। मेरी राजनीति का अंतिम लक्ष्य धर्म और अध्यात्म से पैदा विवेक के जरिए जनता की सेवा करना है। मुझे लेकर चाहे कुछ भी कहा सुना जाए, लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो पाएंगे कि मैं अपने मूल्य और आदर्शो के लिए स्टैंड लेता हूं। मेरा मानना है, सत्य प्रताडि़त हो सकता है, पराजित नहीं।

धर्म और अध्यात्म में इतनी रुचि है, तो संगीत में भी होगी?

बेशक! संगीत को मैं उस परम तत्व से मिलने का सबसे पवित्र जरिया मानता हूं। संगीत अगर दिल से निकला हो, तो सुनने वाले को स"ो आनंद में लीन कर देता है। गुरबाणी के शबद, सूफी संगीत और भारतीय क्लासिकल रागों को मैं ईश्वरीय संगीत मानता हूं। जब भी सफर में होता हूं, तो यही सुनता हूं। जनाब नुसरत फतेह अली खान, बड़े गुलाम अली खान और जगजीत सिंह मेरे पसंदीदा गायक हैं।

किताबें पढ़ने का भी शौक रखते हैं?

मैंने बहुत-सी किताबें पढ़ी हैं। मैने शुरू में बताया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अनुवाद, द कंप्लीट व‌र्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद और द गास्पेल ऑफ रामाकृष्णा ऐसी पुस्तकें हैं, जो मुझे हमेशा प्रेरित करती हैं। इनसे मैं हर रोज कुछ न कुछ सीखता हूं। इसके अलावा, जब मैं क्रिकेट खेलता था, तो मोहम्मद अली की आई एम द ग्रेटेस्ट हमेशा मेरी किट में रहती थी। इससे आज भी मुझे प्रेरणा मिलती है।

फिल्में भी देखते हैं?

शुरू से ही क्रिकेट, कमेंट्री और राजनीति के बीच फिल्में देखने का मौका नहीं मिला, लेकिन मुझे संदेश देने वाली फिल्में बहुत पसंद हैं। मैंने अपनी पंजाबी फिल्म मेरा पिंड इसी वजह से की थी। इसके अलावा मनोज कुमार की शहीद और रंग दे बसंती ऐसी फिल्में हैं, जो मेरे मन को व्यथित करती हैं।

आपने रंग दे बसंती की बात की, जो युवाओं के आक्रोश पर आधारित थी। आज के युवा को और उसके आक्रोश को किस तरह देखते हैं?

आज के युवा हर चीज को आसान समझते हैं। जब वे सिस्टम को बदल नहीं पाते, तो आक्रोश में आकर अपने लक्ष्य को और दूर कर लेते हैं। जिंदगी इतनी आसान नहीं है। सोते हुए शेर के मुंह में शिकार खुद नहीं आता। उसके लिए कुछ करना पड़ता है। सतत संघर्ष और मेहनत ही युवा के इस आक्रोश को सही दिशा दे सकती है।

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