..तो जीत के करीब रहकर भी दूर ही रहेंगे   
 
 

[सुनील गावस्कर की कलम से]

सीरीज में दूसरी नजदीकी हार से उबरना है तो भारत को मानसिक रूप से सुदृढ़ होकर सामने आना होगा। अगले दोनों मैच और सीरीज जीतने के लिए यह बहुत ही जरूरी है। भारत को दुनिया की शीर्ष टीम बनने के लिए अब थोड़ा इंतजार करना होगा।

मोहाली में भारत के पास इसका अच्छा मौका था। अगर वह सीरीज हारते हैं फिर भी बाद में शीर्ष टीम बनने का मौका उनके पास होगा, क्योंकि उन्हें आगे भी काफी वनडे खेलने हैं। हां, उन्हें यह भी पता है कि वह वहां पहुंचने के हकदार नहीं होंगे, क्योंकि नंबर वन टीम बनने के लिए जिस टीम से उसका मुकाबला है उसी से हार जाएंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत को अगले दो मैचों के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। चोटों से जूझती आस्ट्रेलियाई टीम ने जिस तरह से मुकाबला किया है, वह न केवल दोनों देशों की घरेलू क्रिकेट की संरचना के स्तर में फर्क पैदा करता है बल्कि दोनों देशों की नीतियों को भी सामने लाता है।

अगर भारत में यह ढांचा न बदला गया तो हम जीत के करीब पहुंच कर भी बहुत दूर ही रह जाएंगे। अगर हम सीरीज से पहले चोटिल हुए आस्ट्रेलिया के नियमित क्रिकेटरों माइकल क्लार्क और नाथन ब्रैकन के या फिर सीरीज के बीच में चोट के चलते वापस चले गए खिलाडि़यों के विकल्प को देखें तो साफ हो जाता है कि कम समय में बिना अधिक तैयारी के जो खिलाड़ी टीम से जुड़े वे कई सालों से घरेलू क्रिकेट में खेलने के बाद ही राष्ट्रीय टीम में आए। यही कारण है कि ये मुश्किल मैचों में बेहतर खेले और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगला कदम रखने को अच्छी तरह तैयार हैं।

भारतीयों की तरह ही आस्ट्रेलियाई टेस्ट व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी मुश्किल से ही घरेलू क्रिकेट में खेलते होंगे। इसका कारण है व्यस्त अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम, इसलिए ऐसा नहीं है कि क्वालिटी शीर्ष स्तर की है। हां, वहां प्रतियोगिता का स्तर इतना ज्यादा है कि आस्ट्रेलियाई मुश्किल परिस्थितियों के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। भारत की तरह ही आस्ट्रेलिया भी आईसीसी अंडर-19 विश्व कप खेलता है, लेकिन उसके कितने अंडर-19 क्रिकेटर हैं, जिन्हें जूनियर क्रिकेट में प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय टीम में जगह मिलती है। उन्हें प्रथम श्रेणी क्रिकेट की धूल फांकनी पड़ती है और आस्ट्रेलियाई कैप हासिल करने से पहले उन्हें वहां अच्छा प्रदर्शन करना पड़ता है। माइक हसी ने सालों रन बनाए तब जाकर राष्ट्रीय टीम में उन्हें मौका मिला। वह अच्छे-खासे अनुभव के साथ आए।

भारत में राष्ट्रीय कैप बहुत आसानी से मिल जाती है। यहां युवा खिलाडि़यों को प्रथम श्रेणी में खेले बिना भी राष्ट्रीय टीम में शामिल कर लिया जाता है। इसके लिए इन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अनुभव की कमी जल्द ही इनकी पोल भी खोल देती है। युवाओं को आगे बढ़ाओ, लेकिन पहले उन्हें प्रथम श्रेणी क्रिकेट में खुद को साबित करने का मौका दो।

[पीएमजी]

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