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घरेलू मैदान पर फेल होना चिंता का विषय

घरेलू मैदान पर फेल होना चिंता का विषय

[स्टीफन फ्लेमिंग की कलम से]

इस बार आइपीएल में आखिरी ओवर और आखिरी गेंद तक खिंचे मैचों की बढ़ी संख्या से मैं आश्चर्यचकित हूं। इससे रोमांच पैदा हो रहा है और रोमांच किसी भी प्रतियोगिता की सेहत के लिए फायदेमंद साबित होता है। इससे यह भी दिख रहा है कि टीमें दो अंकों के लिए किस कदर मेहनत कर रही हैं। निसंदेह दर्शकों को आनंद आ रहा होगा, लेकिन टीम के कोच की सेहत के लिए यह लाभदायक नहीं है।

हमारी टीम [चेन्नई सुपरकिंग्स] के लिए स्थिति लगभग करो या मरो जैसी हो गई है। नॉकआउट चरण में जगह सुनिश्चित करने के लिए हमें अपने आगे के छह मैचों में से कम से कम चार में जीत दर्ज करनी ही होगी। टीम को अपने प्रदर्शन में सुधार लाना होगा। ऐसा नहीं है कि हमारी स्थिति बहुत खराब हो गई है, लेकिन अंकतालिका को देखने के बाद यह पता लगता है कि सभी टीमें एक दूसरे के बेहद करीब हैं और प्लेऑफ में जगह बनाने के लिए सभी के पास मौका है।

पिछले सत्र में हम अपने मैदान पर लगातार जीत रहे थे, लेकिन इस बार कहानी उलट गई है। घरेलू मैदान पर हमारा फेल होना चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले साल भी शुरुआत में हमारी स्थिति कुछ ऐसी ही थी, लेकिन हमने अपने प्रदर्शन को उठाते हुए अंत में चैंपियनशिप जीती थी। इस बार भी मुझे अपनी टीम से पिछली बार वाले प्रदर्शन के दोहराव की उम्मीद है।

[टीसीएम]

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