[सुरेंद्र कुमार वर्मा]
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से एक महीने से आराम फरमा रहे भारतीय क्रिकेटर इस समय भी हर जगह चर्चा का विषय बने हुए हैं। जैसे-जैसे विवाद आगे बढ़ रहा है उनके समर्थकों की संख्या में गिरावट भी आती जा रही है। चर्चा में रहने का कारण है विश्व रोधी डोपिंग एजेंसी [वाडा] के उस विवादित नियम का जिसके अंतर्गत खिलाडि़यों को प्रत्येक दिन एक घंटे अपनी उपलब्धता की विस्तृत जानकारी देनी होगी जिससे वाडा के अधिकारी बिना सूचना के टूर्नामेंट के बाहर कभी भी उनकी जांच कर सकें।
क्रिकेटरों के दस्तखत करने से इनकार के बाद खेल मंत्री एमएस गिल समेत भारतीय खेल जगत के अन्य खिलाड़ी भी क्रिकेटरों के रवैये की आलोचना कर चुके हैं। उनका कहना है कि इससे खिलाडि़यों की निजता में दखलंदाजी नहीं होती है। खेल मंत्री रईस बीसीसीआई के खिलाडि़यों के दंभपूर्ण फैसले से हैरान हैं वे कहते हैं कि जब दुनिया भर के खिलाडि़यों ने बिना किसी शोर-शराबे के हर मसौदे पर हस्ताक्षर कर दिए हैं तो सिर्फ क्रिकेटरों को इससे दिक्कत क्यों हो रही है। कहने को तो राफेल नडाल और एंडी मरे, जर्मन फुटबालर माइकल बालाक, पोल वाल्ट क्वीन रूस की एलेना इसिनबायेवा भी विवादित नियम की आलोचना कर चुके हैं फिर भी उसे स्वीकार कर लिया है। नौ ग्रैंड स्लैम और ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता लिएंडर पेस भी मानते हैं कि इसमें सुधार होना चाहिए लेकिन हमें खेल से डोपिंग को समाप्त करने के लिए इसे स्वीकार करना ही होगा। महेश भूपति और सानिया मिर्जा भी क्रिकेटरों को सलाह दे चुके हैं कि खिलाड़ी होने के नाते उन्हें बिना किसी बहस के वाडा के फार्म पर दस्तखत कर देना चाहिए।
कप्तान महेंद्र सिंह धौनी, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर, युवराज सिंह, इरफान पठान और हरभजन सिंह समेत टीम इंडिया के 11 क्रिकेटरों को वाडा डोपिंगरोधी धारा पर दस्तखत करना है हालांकि निजता को लेकर वे इसे स्वीकार करने में सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। इन स्टार क्रिकेटरों का कहना है कि विस्तृत जानकारी देने से उनकी सुरक्षा और व्यक्तिगत जिंदगी में दखल बढ़ जाएगी। सचिन और धौनी को कई बार धमकी भी मिल चुकी है। लेकिन इस मसविदे का विरोध करने वाले खिलाड़ी यह भूल जाते हैं कि वाडा एक जिम्मेदार संस्था है और इसके जांच में दुनिया भर के सभी खेल और खिलाड़ी आते हैं।
कुछ खिलाडि़यों द्वारा वाडा के नियमों पर विवाद उठाए जाने से यह आशंका भी घर करने लगी है कि कहीं ये लोग डोप टेस्ट से घबरा तो नहीं रहे हैं। अब तक क्रिकेट में डोप टेस्ट नहीं होता था इसलिए खिलाड़ी इससे आराम से बच जाते थे लेकिन क्रिकेट की सर्वोच्च नियामक संस्था अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद [आईसीसी] द्वारा वाडा से समझौता कर लेने के बाद किसी भी बोर्ड के खिलाडि़यों के विरोध का कोई मायने नहीं रहता क्योंकि शीर्ष संस्था द्वारा दस्तखत कर देने के बाद स्वत: ही उसके अंतर्गत आ जाते हैं। क्रिकेट को ओलंपिक या एशियाड का हिस्सा बनाने के लिए भी यह एक अनिवार्य शर्त है कि वह वाडा के जांच के दायरे में आते हों। वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी [वाडा] एक निजी संस्था है और 10 नवंबर 1999 को लुसाने, स्विट्जरलैंड में इस एजेंसी का गठन किया गया। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति [आईओसी] से समझौते के बाद वाडा खेलों से डोपिंग को दूर रखने का कड़ाई से प्रयास कर रही है। इसके बाद खेलों में तेजी से बढ़ रहे प्रतिबंधित दवाओं के सेवन पर रोक लगाने के मकसद से दुनिया के लगभग 600 खेल संगठनों ने वाडा के संहिता को स्वीकार कर लिया है।
टेनिस, बैडमिंटन, निशानेबाजी, मुक्केबाजी और कुश्ती आदि खेलों के शीर्ष भारतीय खिलाडि़यों ने भी क्रिकेटरों के इनकार को उनका नखरा माना है। वे कहते हैं कि हम भी वाडा के शर्तो को स्वीकार कर चुके हैं लेकिन थोड़ी बहुत दिक्कतों को छोड़ दिया जाए तो समस्या नहीं आती। ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा भी इसे बड़ी बात नहीं मानते हैं और इससे सुरक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ओलंपिक कांस्य पदक विजेता विजेंदर कुमार और सुशील कुमार, महेश भूपति, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल सभी की निजी जिंदगी है लेकिन डोप को खेल से दूर रखने के अभियान में वे वाडा को भरपूर सहयोग दे रहे हैं। वाडा जिस मकसद से कड़े नियम तैयार कर इसे खिलाडि़यों को मानने के लिए विवश करती है उसके पीछे यही धारणा है कि खेलों को डोपिंग के भूत को खत्म किया जाए। अभी तो यह शुरुआत है कि फार्म भरने की प्रक्रिया चल रही है। एथलेटिक्स व अन्य खेलों में वाडा की पैनी निगाह के बावजूद धड़ल्ले से खिलाडि़यों द्वारा डोपिंग किया जाता है। एथलेटिक्स में ओलंपिक चैंपियन जैसे खिलाडि़यों से डोप लेने के कारण पदक भी छीने जा चुके हैं।
फुटबाल की सर्वोच्च विश्व संस्था फीफा भी इस विवादास्पद धारा की समीक्षा करने के लिए बातचीत कर रही है। भारतीय खिलाडि़यों का व्यवहार कभी-कभी अडि़यल हो जाता है जो किसी के भी पल्ले नहीं पड़ता है। बीसीसीआई और उसके क्रिकेटर कुछ इस तरह का रवैया अपनाते हैं कि वे खेल से भी ऊंचे हैं। बीसीसीआई की यह हरकत उसकी आदत में शुमार हो गया है कि आईसीसी को हर कदम पर परेशान किया जाए। देखा जाए तो विवाद को तूल देने का कोई फायदा नहीं मिलेगा आईसीसी से समझौता के बाद बीसीसीआई स्वत: ही उससे जुड़ गया है। बीसीसीआई की आपत्ति के बाद बावजूद आईसीसी वाडा के ठहरने संबंधी शर्त के समाधान के लिए आगे आया है और समिति का गठन कर जल्द-जल्द से इसे सुलझाना चाहता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि खेलों को डोप से मुक्त रखने के अभियान में किसी तरह का रोड़ा नहीं अटकाना चाहिए। भारतीय क्रिकेटरों द्वारा अनावश्यक रूप से विवाद को जन्म देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। क्रिकेट मैच फिक्सिंग का प्रकोप झेल चुका है और अब डोपिंग टेस्ट के बाद स्थिति स्पष्ट होगी कि क्रिकेट में किस स्तर तक प्रतिबंधित दवाओं का सेवन होता है।
लेख को दर्जा दें
दर्जा दें(55) वोट का औसत
Saving...
|



