[सुनील गावस्कर की कलम से] बेचारे वी जयदेवन, एक बार फिर आइसीसी ने मौसम से प्रभावित वनडे मैचों में लक्ष्य गणना करने की उनकी पद्धति को अस्वीकार करते हुए डकवर्थ-लुइस प्रणाली को बरकरार रखा, जबकि जयदेवन ने इस पद्धति के दोषों को भी दिखाया था। दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया के आइपीएल में व्यस्त होने के कारण उन्हें समर्थन नहीं मिल पाया, जिससे काफी फर्क पड़ सकता था। आइसीसी ने दोनों पद्धतियों की तुलना का काम डकवर्थ जैसे इंग्लिश व्यक्ति को सौंपा जो खुद भी उसकी समिति में हैं।
यदि यही काम किसी भारतीय को सौंपा गया होता तो विदेश खासकर ब्रिटिश मीडिया द्वारा कितना शोरगुल मचाया गया होता, जरा इसकी कल्पना कीजिए। न्यायत: जयदेवन की पद्धति को एक वर्ष तक आजमाया जाना चाहिए था जैसा की वे प्रायोगिक नियमों के साथ करते हैं और तब फैसला लिया जा सकता था। अभी वेस्टइंडीज की टीम इंग्लैंड दौरे पर है। कैरेबियाई टीम को एकजुट होने में समस्या आ रही है क्योंकि उन द्वीपों की अपनी अलग-अलग पहचान, संस्कृति और मुद्राएं हैं तथा वे हमेशा अपेक्षित ढंग से घुल-मिल नहीं पाते। सबसे पहले फ्रैंक वॉरेल उन्हें एक साथ लाए और इस नेक कार्य को सर गैरी सॉबर्स ने आगे बढ़ाया। क्लाइव लॉयड और विवियन रिचर्ड्स ने अपने दमदार व्यक्तित्व के साथ उन्हें संगठित रखा। डेरेन सैमी एक अच्छे इंसान हैं, लेकिन उनके पास इन दिग्गजों जैसा क्रिकेटीय कद नहीं है और इसलिए वेस्टइंडीज का प्रदर्शन सतही रहा है। मर्लोन सैमुअल्स अब अपनी प्रतिभा को पहचानने लगे हैं। उनमें कुछ-कुछ कार्ल हूपर की झलक देखने को मिलती है। इंग्लिश क्रिकेटरों द्वारा उकसाए जाने के बावजूद उन्होंने दूसरे टेस्ट की दोनों पारियों में शतक जमाया। उनकी टीम को इसके बावजूद हार मिली, लेकिन अपनी संयमी पारी के लिए वह सप्ताह के सिएट अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर बने हैं। [पीएमजी]
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