योग दर्शन त्रिविध तापों [आधिदैविक, आधिभौतिक, आधिदैहिक]से मुक्ति के व्यावहारिक पक्ष का विश्लेषण करता है। इसके सैद्धांतिक पक्ष की चर्चा सांख्य दर्शन का विषयवस्तु है। पुरुष मनुष्य का चेतन तत्व है, जो निरंतर प्रकृति के विभिन्न आयामों के बारे में
श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी है। इसलिए इसे प्रभु का रूप भी माना जाता है। इसका जन्म महाभारत काल में माघ शुक्ल एकादशी [मोक्षदा एकादशी] को कुरुक्षेत्र [हरियाणा] में उस समय हुआ था, जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने कर्तव्य से विमुख अर्जुन को उपदेश दिया था।
सुष्मिताचंद्रा के पति को दिल का दौरा पडा था। सर्जरी के दौरान वे उनकी सलामती के लिए प्रार्थना करने बैठ गई। उन्होंने अपने कई मित्रों को भी ऐसा करने का आग्रह किया। आज सुष्मिताजैसे कई लोग हैं। उनका विश्वास है
रसिकों के परम आराध्य श्रीबांकेबिहारी की महिमा का गुणगान किए बिना वृंदावन की चर्चा अधूरी है। उनके प्रकट होने की कथा अद्भुत है। माना जाता है कि आज से लगभग पांच शताब्दी पूर्व राधा रानी की सखी ललिता ने स्वामी हरिदास के रूप में अवतार लिया।
जब कभी हमें लंबा सफर करना पड़ता है, तब हम पहले ही सोच लेते हैं कि पहले, दूसरे और तीसरे दिन कितनी-कितनी दूर जाएंगे। अपने कुल सफर को हम कई मंजिलों में बांट देते हैं। जब एक मंजिल तय कर लेते हैं, तब दूसरे की तैयारी करते हैं। अगर एक मंजिल न जाएं, तो दूसरे की तैयारी की फिक्र नहीं रहती।