भृगुश्रेष्ठमहर्षि जमदग्निद्वारा संपन्न पुत्रेष्टि-यज्ञसे प्रसन्न देवराज इंद्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववंद्यमहाबाहुपरशुराम का जन्म हुआ। वे भगवान् विष्णु के आवेशावतारथे। पितामह भृगुद्वारा संपन्न नामकरण-संस्कार के अनन्तर राम, किंतु जमदग्निका पुत्र होने के
भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधारस्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता श्रीवल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मणभट्ट जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार [अग्नि का अवतार] कहा गया है। वे वेदशास्त्र में पारंगत थे।
श्रीकृष्ण चैतन्यदेव का पृथ्वी पर अवतरण विक्रम संवत् 1542 (सन् 1486 ई.) के फाल्गुन मास की पूíणमा को संध्याकाल में चन्द्र-ग्रहण के समय सिंह-लग्न में बंगाल के नवद्वीप नामक ग्राम में भगवन्नाम-संकीर्तन की महिमा स्थापित करने के लिए हुआ था।
ऋषियों को वेदों ने प्रजापति के अंग-भूत की संज्ञा दी है; उन्हें जन्म से ही सच्चे धर्म का ज्ञान था एवं आचरण भी उसी के अनुरूप होता था। वे त्रिकालदर्शी होते थे। सतयुग के उन्हीं श्रेष्ठ ऋषियों में थे महर्षि सौभरि। ब्रह्मा जी के पौत्र महर्षि घोर के पौत्र ऋषि सौभरि मंत्रद्रष्टा महर्षि कण्व के पुत्र थे।
अत्यंत सामान्य परिवार में माघी पूर्णिमा के दिन काशी के समीप जन्मे रैदासने अपने असामान्य चिंतन एवं कार्य से संत समाज में प्रतिष्ठा पाई। अपने श्रेष्ठ उदात्त कर्म और सात्विक मन की निर्मलता से रैदाससंत रविदास नाम से विख्यात हुए।