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हरि पालनैं झुलावै जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥ मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै। तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै॥ कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं।  
निसि दिन बरषत नैन हमारे निसि दिन बरषत नैन हमारे। सदा रहति बरषा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे॥ दृग अंजन न रहत निसि बासर कर कपोल भए कारे। कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूं उर बिच बहत पनारे॥ आंसू  
तू दयालु दीन हौं तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी। हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी॥ नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो। मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसो॥ ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो। तात-मात,  
सकल सुख के कारन भजि मन नंद नंदन चरन। परम पंकज अति मनोहर सकल सुख के करन॥ सनक संकर ध्यान धारत निगम आगम बरन। सेस सारद रिषय नारद संत चिंतन सरन॥ पद-पराग प्रताप दुर्लभ रमा कौ हित करन। परसि गंगा  
गोकुल गांव के ग्वारन मानुष हौं तो वहीं रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर-धारन। जो  
 
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