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ऋग्वेद में वर्णित देवताओं में सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। वैदिक काल में सूर्य की उपासना विशेष रूप से प्रचलित थी। हालांकि आज सौर उपासकों की संख्या नगण्य हो गई है, लेकिन अनेक स्त्री-पुरुष शारीरिक व्याधियोंऔर चर्म-रोगों से मुक्ति पाने  
कामना सिद्धि के लिये काम: कामप्रद: कान्त: कामपालस्तथा हरि:। आनन्दो माधवश्चैव कामसंसिद्धये जपेत्॥ अभीष्ट कामना की सिद्धि के लिये काम, कामप्रद, कान्त, कामपाल, हरि, आनन्द और माधव- इन नामों का जप करे। शत्रुविजय के लिये राम: परशुरामश्च नृसिंहो विष्णुरेव च।  
इष्टापूर्तानि कर्माणि सुबहूनि कृतान्यपि। भवे हेतूनि तान्येव हरेर्नाम तु मुक्तिदम्॥ (बोधायनसंहिता) इष्ट (यज्ञ-यागदि) और आपूर्त (कूप-वाटिका-निर्माण आदि) कर्म कितनी ही अधिक संख्या में क्यों न किये जायँ, वे ही भव-बन्धन के कारण बनते हैं। परंतु श्रीहरि का नाम लिया जाय  
पापानलस्य दीप्तस्य मा कुर्वन्तु भयं नरा:। गोविन्दनाममेघौघैर्नश्यते नीरबिन्दुभि:॥ लोग प्रज्वलित पापागिन् से भय न करें; क्योंकि वह गोविन्दनामरूपी मेघसमूहों के जल-बिन्दुओं से नष्ट हो जाती है। अवशेनापि यन्नामिन् कीर्तिते सर्वपातकै:। पुमान् विमुच्यते सद्य: सिंहत्रस्तैमर्ृगैरिव॥ विवश होकर भी भगवान् के नाम  
कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान्गुण:। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तबन्ध: परं ब्रजेत्॥ (श्रीमद्भागवत) राजन्! दोषों के भंडार कलियुग में यहीं एक महान् गुण है कि इस समय श्रीकृष्ण का कीर्तनमात्र करने से मनुष्य बन्धमुक्त हो परमपद को प्राप्त हो जाता है। यदभ्य‌र्च्य हरिं  
 
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