बहादुरगढ [जागरण संवाद केंद्र]। लाइन पार स्थित शिव मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए पंडित जय भगवान कसारियाने कहा कि ध्यान की गहन भाव दशा में उतर कर जब मनुष्य प्रभु की भक्ति में डूब जाता है तो उसे प्रार्थना नहीं करनी पडती क्योंकि उसका अस्तित्व ही प्रार्थना रूप हो जाता है। यानी प्रार्थना बुद्धि का नहीं हृदय का विषय है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य ध्यान में होता तो उस समय उसके प्राण में स्वत:ही प्रार्थना गूंजती है। उसके रोम-रोम से प्रार्थना मधुर संगीत के रूप में खुद उठने लगती है जिससे उसका अस्तित्व ही प्रार्थना रूप हो जाता है और भक्त के मन में भगवान की भक्ति का भाव ही होता है। उसके मन में प्रभु से मिलन के अलावा कोई भाव नही होता है।
उन्होंने कहा कि ध्यान में उतरकर भक्त पर जब प्रभु की दृष्टि पड जाती है तो उसका जीवन धन्य और सफल हो जाता है। ध्यान को मौन प्रार्थना बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रार्थना मन-बुद्धि का विषय नहीं है, वह तो हृदय का विषय है। सच्ची प्रार्थना तो हृदय में उतरी हुई एक मधुर भाव दशा है जहां कोई भाषा व्याकरण और शब्दों का जाल नहीं चलता। उन्होंने कहा कि परमात्मा हृदय में विराजमान है और वह केवल हृदय की भाषा ही जानते है।
ध्यान के समय भक्त प्रभु से चाहे कितना दूर क्यों न हो, वह सदा उनके उन्मुख रहता है। प्रभु की ओर अनुगृहीत भाव से उन्मुख रहना ही भाव पूर्ण प्रार्थना है और भाव पूर्ण प्रार्थना ही प्रभु को स्वीकार्य है। जो प्रार्थना भाव के माधुर्य से हो, वही परमात्मा के द्वार पर दस्तक दे सकती है। उन्होंने कहा कि ध्यान विचार दशा से भाव दशा में उतरना है। भाव विचार नहीं हैं। विचार तो मन के तल से उठते हैं, हृदय से नहीं। विचारों का आदान-प्रदान हो सकता है परन्तु भाव स्वयं के अनुभव व अनुभूति का विषय है क्योंकि भाव भीतरी एहसास है।
उन्होंने कहा कि प्रभु भक्ति के लिए किसी आडम्बर की जरूरत नहीं है क्योंकि परमात्मा को सीधे-साधे भक्त ही प्रिय हैं।
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