लेखिका और एथलीट केरोलिनस्कॉट कोर्जकहती हैं कि टहलना आपके ध्यान का माध्यम बन सकता है और अंतत:आप अध्यात्म से भी जुड सकते हैं। दरअसल, टहलते वक्त हम नितांत अकेले होते हैं, इसलिए मन में कई प्रकार के प्रश्न उठने लाजिमी है, जैसे-मैं कौन हूं? मेरी जिंदगी का उद्देश्य क्या है?
क्या मैं इसे पूरा कर पा रहा/रही हूं या नहीं? यह सच है कि ऐसे विचार हमें एकाग्रचित्त करते हैं, यानी ध्यान की ओर ले जाते हैं। ओशोराजयोग सेंटर से जुडी मां प्रेम नयनाबताती हैं कि ओशोभी यह मानते थे कि किसी भी प्रक्रिया, जैसे-खाना, पीना, टहलना, सुनना, बातचीत करने को ध्यान का माध्यम बनाया जा सकता है, बशर्ते आप इस दौरान सावधान हों, चेतना में हों।
ओशोमानते थे कि अपनी क्रियाओं के प्रति सचेत होना ही मेडिटेशनहै। चेतना हमारी व्यग्रताको समाप्त करती है। बुद्धि को 100प्रतिशत प्रयोग करना सिखाती है। उत्तरदायित्व लेना सिखाती है। स्पष्ट शब्दों में कहें, तो किसी भी चीज को दर्पण के समान देखना ही चेतना है।
विपस्सना-विपस्सनाके दो अर्थ होते हैं- 1.किसी भी चीज को विस्तारित रूप में देखना।
2.भारत में वैदिक युग में विपस्सनाका अर्थ अपने शरीर के अंदर यात्रा करने से लगाया जाता था। इसमें साधक सांसों के घोडे पर सवार होकर शरीर के अंदर अलग-अलग अंगों की यात्रा करते थे। इसमें आंखें बंद कर सांस लेते हुए यह महसूस किया जाता था कि हमारी सांसें क्रमश:हाथ, पैर, घुटनों से होती हुई अन्य अंगों की यात्रा कर रही हैं।
यदि किसी अंग में दर्द या तकलीफ है, तो वहां अधिक देर तक सांसें लेते हुए उसे महसूस किया जाता था। मान्यता थी कि यदि इस क्रिया का लगातार प्रयोग किया जाए, तो संबंधित अंग की बीमारी दूर हो जाती है। 25सौ वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने इसकी दोबारा खोज की।
मान्यता है कि भगवान बुद्ध दो अवस्थाओं में ध्यान किया करते थे। बैठकर और टहलकर। बोधगयामें जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान पाया था, वहां एक मंदिर है। मंदिर के बगल में एक लंबी कतार में कुछ पत्थर रखे हुए हैं। यह उनके टहलकर ध्यान करने को दर्शाते हैं। मंदिर के पीछे बोधिवृक्ष है, जहां वे बैठकर ध्यान किया करते थे। विपस्सनाऔर बुद्ध के ध्यान में टहलने की प्रक्रिया को आधार बनाकर ओशोने विपस्सनावॉकिंगमेडिटेशनका विकास किया। यदि आप इसे आजमाना चाहते हैं, तो इन क्रियाओं को आजमा सकते हैं-
-चुपचाप एक घंटे शांत बैठकर अपने विचारों की चौकसी करें।
-एक घंटे बाद धीरे-धीरे टहलें और लगातार अपने विचारों और क्रियाओं पर भी नजर रखें। एक घंटे बैठें, फिर एक घंटे टहलें। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराएं। इससे आप बहुत ही सुंदर अनुभव करेंगे, क्योंकि दस दिनों के बाद बैठने, टहलने यहां तक कि सोने के दौरान भी आपको यह महसूस होगा कि आपके अंदर कुछ है, जो लगातार आपको चौकस बनाए हुए है।
यह जागरूकता 24घंटे की हो जाती है। वास्तव में, यहीं से आप चैतन्य होना शुरू हो जाते हैं। हां, जब आप इस अभ्यास की शुरुआत करें, तो शांत और नीरव स्थान में करें।
तरीका-धीरे-धीरे टहलना ही विपस्सनाहै। तलवे जमीन को अच्छी तरह छू रहे हैं या नहीं, विशेष रूप से आपको इस पर ध्यान देना है। यदि इस दौरान आपका ध्यान कहीं और भटक जाता है, तो तलवे पर ध्यान देना छोड कर उस भटकाने वाले विषय पर ध्यान दें, फिर अपने तलवे की ओर लौटें।
मनोवैज्ञानिक स्वाती मुखर्जी के अनुसार, टहलने से हमारा दिमाग प्रभावित होता है। जब हम टहलते हैं, तो शारीरिक गतिविधियों के कारण हार्मोन का स्त्राव होता है। यह हार्मोन हमारे तनाव को कम करता है और हमें रिलैक्सफील कराता है। चिकित्सा की होलिस्टिककॉन्सेप्टके अनुसार, शरीर और मन एक दूसरे से जुडे होते हैं। यदि हम मानसिक परेशानियों से घिरे होते हैं, तो यही शारीरिक रोग के रूप में उभरकर हमारे सामने आता है।
यदि हम टहलते हैं, तो कैलोरी बर्नहोती है, ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है और मन प्रफुल्लित महसूस करता है। हार्ट केयर ऑफ इंडिया के प्रेसीडेंट डॉ. के.के. अग्रवाल मानते हैं कि यदि कोई स्वस्थ आदमी प्रतिदिन 80मिनट टहलता है, तो हार्ट अटैक होने की संभावना न के बराबर हो जाती है। यह एक नेचुरल बायपासहै।
किनहिन-जापानमें टहलने के ध्यान की प्रक्रिया को किनहिनकहते हैं। इसके अनुसार, यदि आप लंबे समय से बैठकर ध्यान [जाजेन] कर रहे हैं, तो बीच में उठकर एक ही दिशा में टहलना शुरू कर दें। इसमें एक हथेली की मुठ्ठी बनाएं और दूसरी हथेली से उसे ढक लें। इसी मुद्रा में धीमे-धीमे टहलें। गहरी सांस लेकर पैर उठाएं। टहलने की यह धीमी प्रक्रिया आपके दिमाग और शरीर, दोनों को स्वस्थ बनाती है।