बहादुरगढ [जासंकें]। नई बस्ती स्थित बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित गोविन्दरामने कहा कि मानव सुख की तलाश में इधर-उधर भटक रहा है, लेकिन वह अपने मन में झांक कर नहीं देखता। जबकि मनुष्य के मन में ही सुख का सागर होता है।
भ्रमित मानव भौतिक सुख पाने के लिए सांसारिक वस्तुओं के पीछे तो अंधा होकर भाग रहा है और आध्यात्मिक सुख से विमुख होता जा रहा है जो कि उसके दुख का असल कारण है। पंडित जी ने कहा कि संसार में जिस मानव के पास सभी सुख सुविधाएं है वह भी सुखी नहीं है। सुख केवल भगवान के शरणागत होने पर ही मिलता है।
आत्मिक शांति सुविधाओं से नहीं बल्कि प्रभु चरणों में मन लगाने से मिलती है। प्रभु हर जगह विद्यमान है उनको कहीं पर ढूंढने की जरूरत नहीं है। सुख के लिए सत् गुरू की आवश्यकता होती है जो शिष्य को अंतर्मुखी होने का मंत्र देकर उसकी जिंदगी को संवाद देता है। गुरू ही शिष्य को जीवन के रहस्यों से परिचित कराते है। उन्होंने कहा कि प्रभु चिंतन महान कार्य है और प्रभु का स्मरण करना व उन्हें पाना बहुत सरल है। भगवान केवल प्रेम के भूखे होते हैं। संसार की कोई अन्य बात व चीज उन्हें प्रभावित नहीं कर सकती। दुनिया समझती है कि भगवान तीर्थ में है, मंदिर में है, गिरजाघर में है, मस्जिद में है। जबकि ऐसा नही है भगवान तो हर जगह विद्यमान है।
मानव व्यर्थ में भ्रमित होकर भगवान की तलाश में भटकता है। परंतु असल बात यह है कि अगर कभी भगवान तुम्हारे सामने आ गए तो ऐसी कौन सी कसौटी है जिससे तुम उसे पहचान सको। यदि इंसान बाजार में कुछ खरादने के लिए जाता है तो उसे लेने से पहले वह कसौटी पर कसता है परंतु भगवान को पहचानने के लिए उसके पास कोई कसौटी नहीं है। न कोई ऐसी आंख है जिससे भगवान को पहचाना जा सके। केवल सद् गुरू ही इंसान को भगवान को जानने व पाने में सहायता कर सकते हैं। सद् गुरू द्वारा सिखाए ज्ञान व बताए मार्ग पर चलकर मनुष्य मुक्ति पा सकता है।
उन्होंने कहा कि भगवान की नजर में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नही होता है। उनके सामने तो सभी जीवात्मा है, चाहे नारी हो या पुरुष गीता में भगवान अर्जुन को समझाते है कि हम अपनी आत्मा के मित्र भी है और शत्रु भी इस आत्मा के द्वारा अगर हम सांसारिक मोह माया के बंधन में फंस कर भटक जाते है तो हम आत्मा के दुश्मन है क्योंकि इससे हमारी आत्मा जीवन चक्र में फंसी रहती है और यदि हमने धर्म के मार्ग पर चल सत्कर्म करते हुए परमात्मा को जान लिया तो हम अपनी आत्मा के मित्र बन जाते हैं क्योंकि ऐसा करने पर आत्मा जीवन चक्र के बंधनों से मुक्त हो जाती है।
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