परीक्षा खत्म होने से पहले वन्या काफी तनाव में था। इस घबराहट में भगवान की तस्वीर न जाने कितनी बार चूम लिया था। पेट में अजीब सी हलचल हो रही थी। चेस्ट में भी उसे तेज ठंडक महसूस हो रही थी। एक अनजाना सा डर जैसे बार-बार टीस मार रहा था। क्या होगा उस दिन जब रिजल्ट आएगा? कितना अंक मिलेगा उसे? तीन अंक या दो? वह चालीस-पचास अंक पाने के बारे में तो वह सोच भी नहीं सकता था।
रिजल्ट वाले दिन वह छह बार मां से आशीर्वाद लेने जा चुका था। आंटी से बार-बार कह रहा था कि वे प्रार्थना करें। घर आते समय रास्ते में एक भिखारी को उसने दो कोपेक (रूसी सिक्का) दिए। उसे बहुत राहत मिल रही थी। शायद यह उस गलती का पश्चाताप था, जो उसने की भी नहीं थी। स्कूल से वह देर से लौटा। शाम के तकरीबन चार-पांच बजे होंगे। घर आकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गया। चेहरा बिल्कुल पीला पड चुका था। लाल-लाल आंखें व उसके नीचे के काला घेरा साफ बता रहा था कि कितने तनाव में है।
हां, कितने अंक मिले तुम्हें? मां ने उसके बिस्तर के नजदीक आकर पूछा।
वन्या ने मुंह फेर लिया और फफक कर रो पडा। मां सन्न रह गई। उनका मुंह खुला-का-खुला रह गया और जिस कपडे की वह सिलाई कर रही थीं, वह हाथ से छूटकर जमीन पर आ गिरा।
तुम रो क्यों रहे हो? फेल हो गए हो न तुम?- मां ने पूछा।
हां, मैं उजागर हो गया, मुझे दो अंक मिले हैं-वन्या ने धीरे से कहा।
मुझे पता था कि ऐसा ही होगा। हे भगवान, यह पास क्यों नहीं होता? अच्छा बताओ किस विषय में तुम फेल हुए हो? आखिर कारण क्या है?
मां, मैं..फेरो का फ्यूचर क्या है? इस सवाल के जवाब में ओइसोमई की बजाय ओप्सोमोई बता दिया। इसके बाद मुझसे इनक्लाइटिक पार्टिकल्स के बारे में पूछा गया, इसका उत्तर मैं जानता था, लेकिन दुर्भाग्य से मैं इस प्रश्न का भी सही जवाब नहीं दे सका। और इन्हीं छोटी-छोटी गलतियों का नतीजा है कि मुझे दो अंक मिले हैं। मैं निश्चित तौर पर नालायक हूं। मैंने पूरी-पूरी रात जागकर पढाई की.. पूरे हफ्ते चार बजे सुबह उठ जाता था.. लेकिन सब बेकार हो गया मां।
नहीं, तुम्हारी कोई गलती नहीं। गलत तो मैं हूं वन्या। तुमने मुझे बहुत चोट पहुंचाई है। मेरी हालत बदतर हो गई है, तो तुम्हारी वजह से। मैं कितना-कुछ करती हूं तुम्हारे लिए, लेकिन तुम। किसी भी चीज में अच्छे नहीं हो। तुम कुछ कर ही नहीं सकते। मैं खुश नहीं हूं, लेकिन तुम्हें इसकी परवाह नहीं है।
परवाह है। मैंने काम किया है, पूरी रात जगकर मैंने कितनी मेहनत की है, यह आप खुद देख चुकी हैं-वन्या ने तंग आवाज में कहा।
हे भगवान मुझे अपने पास बुला ले। कहां से लाऊं मैं इतनी ताकत कि इस दुख को सह सकूं। कुछ लोग कई बच्चे होने के बावजूद इतने दुखी नहीं होते होंगे। मेरा तो एक ही बच्चा है, लेकिन मुझे इससे कुछ नहीं मिला। मुझ-सा दुखी कोई नहीं होगा।
मां जोरों की सिसकियां भरने लगीं। वन्या वहीं दिवार से सिर टिकाकर वेदना से तडप रहा था। तभी आंटी ने प्रवेश लिया।
क्यों वैसा ही हुआ न, जैसा मैंने अनुमान किया था-आंटी ने वहां के माहौल को देखकर ही वस्तुस्थिति का आकलन करते हुए कहा।
मैं सुबह से परेशान हूं। मुझे अंदाजा था कि कुछ-न-कुछ बुरा होने वाला है और वही हुआ।-आंटी ने फिर कहा।
तुम क्यों उसे शपथ दिला रही थीं कि पास होना ही है? -आंटी ने रुआंसा होकर मां से सवाल किया।
वन्या पास नहीं हुआ, तो यह तुम्हारी गलती है, न कि उसकी। मैंने कहा था कि उसे हाई स्कूल में न भेजो, लेकिन तुमने नहीं माना। मैं बार-बार कहती हूं कि उसे कुज्या की तरह बिजनेस लाइन में डालो, लेकिन तुम्हें इसे अधिकारी बनाना है। ठीक है, जैसी मर्जी। आंटी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
जरा वन्या को देखो, कितना परेशान है। लग नहीं रहा कि वह 13 साल का है। वह महज 10 साल का दिखता है। बीमार लगता है, जैसे उसे प्लेग हो गया हो।
नहीं, प्रिय नास्तेंका, ऐसी कोई बात नहीं है। प्रताडित नहीें कर रही हूं मैं वन्या को। मेरा दुख कोई नहीं समझ पाएगा।-मां ने आंटी से कहा।
मां घर के सबसे छोटे कमरे में बिखरे हुई धान की भूसी को साफ कर रही थी। उस कमरे में येविथी कुजमिच कुपोरोसोव रहते थे। वे किताब पढ रहे थे। येविथी का एक शिक्षित और बुद्धिजीवी के रूप में घर के लोग खूब आदर करते थे। मां ने उनसे अपनी आपबीती सुनाकर मदद मांगी।
क्या आप मेरी मदद नहीं करेंगे? आपको यकीन नहीं हो रहा है कि न वह फेल हो गया है..? आप ही कुछ कीजिए। मैं उसे सजा नहीं दे सकती। मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। यदि आप सजा के तौर पर उसे पीटेंगे, तो मैं आपकी आभारी रहूंगी।
लंबी सांस भरते हुए सामने रखे टेबल को येविथी ने अपनी उंगलियों से बजाया। फिर वे दोबारा गहरी सांस लेकर वन्या की तरफ मुडे।
आप पढी-लिखी हैं, इस बारे में मुझे कुछ नहीं कहना, लेकिन शिक्षित होते हुए भी और एक और मौका देने के बावजूद आप इस युवा लडके को क्यों विद्रोही बना रही हैं। क्यों किया आपने ऐसा?-येविथी ने मां से कहा। उन्होंने लंबे समय तक मां से इस विषय पर बात की।
हां, मेरे बच्चे-वन्या के नजदीक आकर येविथी ने कहा। अपनी स्पीच खत्म कर वन्या को उन्होंने अपना बेल्ट लाकर दिया और कहा- यही एक तरीका है, तुम्हें समझाने का।
वन्या ने जैसे कुछ नहीं समझा। बस थोडा और झुक गया और और अपना सिर येविथी के दोनो घुटनों के बीच घुसाने की कोशिश करने लगा। वह काफी शांत और उदासीन लग रहा था। शायद हर सजा भुगतने को तैयार।
शाम को परिवार के सदस्यों की बैठक हुई। इसमें फैसला हुआ कि वन्या को बिजनेस लाइन में ही भेज दिया जाए।
जेजे टीम
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