टप्पू का एक दोस्त था मन्नू। वह पढाई में थोडा कमजोर था, लेकिन काफी मेहनती था। वार्षिक परीक्षा होने वाली थी। मन्नू परेशान था कि इस बार अच्छे अंक नहीं आए, तो फिर से सबकी डांट खानी पडेगी। उसे प्रधानाचार्य के पास जाकर शर्मिदगी भी उठानी होगी।
उधर टप्पू आत्मविश्वास से भरा था। हमेशा की तरह अकड कर ही सबसे बातें करता। दोस्तों के साथ खेलता और मन्नू को पढते देखता, तो उसका खूब मजाक उडाता। अरे तुम जितनी भी मेहनत कर लो, मगर नंबर नहीं ला पाओगे। टप्पू से यह बात सुनकर मन्नू को बहुत निराशा होती, लेकिन वह चुप रहता और दिन-रात मेहनत करता। टप्पू के माता-पिता उसे पढने को नहीं कहते, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि टप्पू तो पढ ही रहा होगा और कक्षा में प्रथम जरूर आएगा।
परीक्षाएं शुरू हो गईं। टप्पू जब पेपर देकर निकलता, तब मन्नू से कहता, क्यों भाई पेपर ठीक हुआ, पास तो हो जाओगे न! मन्नू इस बात का एक ही जवाब देता-कर्म किया है, तो फल भी जरूर मिलेगा न! यह सुनकर टप्पू को हंसी आ जाती। अंतत: परिणाम का समय आ गया। अध्यापिका कक्षा में आई, तो सभी परेशान थे। वह कभी टप्पू को देखती थीं, तो कभी मन्नू को।
प्रधानाचार्य आए। उन दोनों को पास बुलाया और कहा-आप दोनों में कोई एक कक्षा में प्रथम आया है और दूसरा फेल हुआ है। अब तुम दोनों में से जिसने मेहनत की है, वह आगे आए और यह पुरस्कार ले जाए। दोनों सोच में पड गए। फिर अचानक मन्नू आगे आया और प्रधानाचार्य ने उसे पुरस्कार दे दिया। टप्पू यह देखकर हैरान था और दुखी भी। उसे अपनी गलती महसूस हो रही थी। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे और उसने माता-पिता से माफी मांगी और मन्नू से भी सॉरी कहा।
विशेष भट्टाचार्य, गाजियाबाद
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